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फुरसतिया

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15 Jun 2010
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…एक घंटे की हवाई यात्रा

दिल्ली से देहरादून की उड़ान सबेरे दस बजे थी। हम गेस्ट हाउस से आराम से चले ताकि हवाई अड्डे पहुंचते हुये हड़बड़ा सकें। इस हड़बड़काल में हमें अपने बगल से गुजरता हर व्यक्ति अपना रकीब सा लगा जो हमसे आगे निकलकर हमें यात्रा वंचित करना चाहता है। चेकइन होते ही हड़बड़ी
 
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यात्राओं में बेवकूफ़ियां चंद्रमा की कलाओं की तरह खिलती हैी

कानपुर पिछड़ा शहर है: मोहतरमा फ़ोन पर किसी को बता रहीं थीं- कानपुर पिछड़ा शहर है। मन तो किया कि उनकी बात का विरोध कर डालें लेकिन वो इतनी तल्लीनता से फ़ोनालाप में जुटीं थीं कि डिस्टर्ब करना उचित न लगा। फ़िर नहीं ही किया। अच्छा ही किया वर्ना वे किसी को [...]
 
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…धरती को ठंडा रखने के कुछ अटपटे सुझाव

…धरती लगातार गर्म हो रही है। कुछ लोग ठंडे में बैठे धरती की गरमाहट कम करने के उपाय सोच रहे हैं। सोचने से मन भटकता है तो विचार करने लगते हैं। विचार से थके तो फ़िर सोचने लगे। सोच और विचार की एकरसता से बचने के लिये बीच-बीच में बहस भी करते जा रहे हैं।
 
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….दुनिया बड़ी डम्प्लाट है

विश्व के पलकों पर सुकुमार विचरते हैं जब स्वप्न अजान, न जाने नछत्रों से कौन, निमंत्रण देता मुझको मौन।- जयशंकर प्रसाद पिछले हफ़्ते अखबार में एक खबर पढ़ी। ब्रह्माण्ड में बेहद भारी एक ब्लैकहोल एक सूदूरवर्ती आकाशगंगा से लाखो मील प्रतिघंटा की गति से दूर भागा जा
 
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आपके विरोध में नियमित लिखने वाला ब्लागर आपके लिये बिना पैसे का प्रचारक है

[समर्पण:यह पोस्ट समर्पित हैं उन तमाम अनाम ब्लॉगरों के नाम जो अपना बहुमूल्य समय मेरे प्रति प्रेम प्रदर्शन में खपाते रहते हैं। उनकी मेहनत देखकर यह निस्वार्थ श्रम की भावना में विश्वास बना हुआ है। मैं जब भी उनकी मेहनत के बारे में सोचता हूं मुझे बहुत अफ़सोस
 
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अनूप शुक्ल, दम्भ और अभिमान और मौज की लक्ष्मण रेखा

१.क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? -पंच परमेश्वर २.हम लोग सब विभाजित व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनालिटी) के हैं। हम कहीं करुण होते हैं और कहीं क्रूर होते हैं। इस तथ्य को स्वीकारना चाहिये।- हरिशंकर परसाई दो दिन पहले  ज्ञानजी ने पोस्ट ठेली जिसमें
 
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…यादें हायपर लिंक की तरह होती हैं

कल मेरे कालेज के सीनियर और मेरे बेहद अजीज ज्योति पाण्डेयजी ने मुझे दो फ़ोटो भेजे। इन दोनों में मैं उनके साथ हूं। पहली फोटो में बायें से तीसरा ज्योति पाण्डेय के कन्धे पर हाथ रखे फ़ोटो-स्माइल मारते हुये (मोनेरेको इलाहाबाद में सन 1982-83 में कभी) और दूसरी
 
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…एक ब्लागर की डायरी

स्थान: एक रद्दी की ठेलिया। पात्र: रद्दी की ठेलिया पर मौजूद कुछ फ़टी-पुरानी डायरियां। मौसम: कुछ चिपचिपा सा ही कहना चाहिये। समय: अब छोडिये सब पूछ लेगें का? कुछ तो निजता का सम्मान करिये। माहौल: ये दिल मांगे मोर वाला। सुबह से घर में पचीस बार बताया जा चुका है
 
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….मॉडरेशन के इंतजार टिप्पणियां

स्थान: एक ब्लॉग का टिप्पणी बक्से के बाद का स्थान! पात्र: माडरेशन के इंतजार में बाट जोहती कुछ टिप्पणियां। मौसम: ठीकै है। ब्लागानुकूल! माडरेशन: वह प्रक्रिया जिसके द्वारा किसी ब्लॉग पर आई टिप्पणियों को स्वीकृत, अस्वीकृत या बदला जाता है। टिप्पणी बक्से में
 
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…हम आपकी इज्जत करते हैं!

दारोगाजी उनकी बड़ी इज्जत करते हैं। वे दारोगाजी की इज्जत करते है। दोनो की इज्जत प्रिंसिपल साहब करते है। कोई साला काम तो करता नही है, सब एक-दूसरे की इज्जत करते हैं। रागदरबारी बातचीत बोले तो वार्ता बेहद आत्मीयता पूर्ण माहौल में हो रही थी। जनप्रतिनिधि पांच
 
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…आंख के अन्धे नाम नयनसुख

पिछली पोस्ट में कुछ साथियों ने बताया कि उनको उसके पीछे की बात पता नहीं है। आराधनाजी ने तो लिखा भी: आज तो हम घूम गये ये लेख पढ़कर…सीधे-सीधे चींटी और छछून्दर की बात तो कर नहीं रहे आप…इत्ते सीधे तो हैं नहीं…और पीछे वाली बात क्या है ये मेरी समझ में आ नहीं
 
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…जिन्दगी ऐसी नदी है जिसमें देर तक साथ बह नहीं सकते

कल दिन भर पुराने कैसेट खोजकर कवितायें सुनी। स्व. रमानाथ अवस्थी जी की एक कविता मैं बहुत दिनों से खोज रहा था। कैसेट मिल नहीं रहा था बहुत दिनों से। कल एक बार फ़िर खोजा तब मिल ही गया। इस कैसेट में स्व. रमानाथ अवस्थी जी की कविता : आज इस वक्त आप हैं [...]
 
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छोटी ई, बड़ी ई और वर्णमाला

पिछ्ले कई दिनों से मैं यह बतकही/कहा-सुनी देख रहा हूं! ’छोटी ई’ और ’ बड़ी ई’ आपस में लगातार एक-दूसरे से बतिया/बहसिया रही हैं। तर्क-वितर्क कर रही हैं। लगी पड़ी हैं एक-दूसरे को औकात दिखाने पर। छोटी ई का कहना है कि वर्णमाला में पहले आती है इसलिये वो बड़ी है।
 
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….बगीचे के फ़ूल और पक्षियों की आवाजें

कुछ दिन पहले हमारी श्रीमतीजी ने अपने बगीचे की कुछ फ़ोटुयें खींची। आइये आपको भी दिखाते हैं! नीचे लगाई हैं! देखिये एक-एक कर करके। आराम से। हड़बड़ाइये नहीं! फ़ोटुयें भाग नहीं रही हैं। सिर्फ़ सरक रही हैं आगे की तरफ़ लेकिन आप जिसको चाहेंगे वह रुक भी जायेंगी। बड़ी
 
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…कविता का मसौदा और विश्व गौरैया दिवस

मैं पिछले कई दिन से कविताई के मूड में हूं। कविताई के मूड में मतलब कविता लिखने के मूड में। सब मसाला भी सोच रखा है और हर पल लगता है कि बस अब हुआ तब हुआ। कविता निकाल ही देनी चाहिये। अब और देरी ठीक नहीं। वैसे भी अगर कोई पोस्ट(लेख)लिखने का मसौदा [...]
 
फ़ुरसतिया
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भारतीय आयुध निर्माणियां- जन्मदिन के बहाने एक पोस्ट

भारतीय आयुध निर्माणियाँ सबसे पुरानी एवं सबसे बड़ा औद्योगिक ढांचा हैं जो रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग के अंतर्गत कार्य करती हैं। आयुध निर्माणियां रक्षा हार्डवेयर ( यंत्र सामग्री ) सामान एवं उपस्कर के स्वदेशी उत्पादन के लिए सशस्त्र सेनाओं को
 
फ़ुरसतिया
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लिखौं हाल मैं ब्लागरगण का, माउस देवता होऊ सहाय

सुमिरन करके ब्लागरगण को,औ चिरकुटजी के चरण नवाय, लिखौं हाल मैं ब्लागरगण का, माउस देवता होऊ सहाय। बीता साल पिछलका वाला, आवा नवा धरे मूंछ पर ताव, जनवरी बीती सिकुड़-ठिठुर कर, फ़रवरीजी भी बीती जायें। उठा-पटक और भड़भड़ के बिच,होलीजी भी पहुंचीं आये, बंटे टाइटिल
 
फ़ुरसतिया
Mar 08 2010 11:03 AM
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…मगर अब साजन कैसी होली

होली आवत देखकर ,ब्लागरन करी पुकार, भूला बिसरा लिख दिया,अब आगे को तैयार। पिचकारी ने उचक के, रंग से कहा पुकार, पानी संग मिल जाओ तुम, बनकर उड़ो फुहार। कीचड़ में गुन बहुत हैं, सदा राखिये साथ, बिन पानी बिन रंग के ,साफ कीजिये हाथ। रंग सफेदा भी सुनो ,धांसू है
 
फ़ुरसतिया
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…जहां भी खायी है ठोकर निशान छोड आये

तीन दिन पहले ऑफ़िस में बैठे थे। पता चला सचिन 186 पर खेल रहे हैं। काम भर की शाम हो गयी थी। घर चले आये। टेलीविजन के सामने पसर गये। धोनी अपना बचपना दिखा रहे थे। हां यह बचपना ही है भाई! दूसरे छोर पर आपके साथी द्वारा इतिहास बनने का इंतजार सारा देश कर [...]
 
फ़ुरसतिया
Feb 27 2010 08:33 AM
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जीवन पथ पर मिले इस तरह जैसे यह संसार मिला

दो दिन पहले रमानाथ अवस्थीजी के गीतों का कैसेट मिला तो उसी के साथ एक और दुर्लभ कैसेट मिला। इस कैसेट में हमारे विवाह के अवसर पर गाया गया स्वागत गीत और साथ में कई और मंगलगीत टेप हैं। यह कैसेट कई-कई बार खोया और जितने बार खोया उतने ही बार मिल भी गया। [...]
 
फ़ुरसतिया
Feb 19 2010 05:17 PM
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टुकुर-टुकुर देउरा निहारै बेईमनवा

पिछली पोस्ट में हिमांशु और अमरेन्द्र ने गीतकार लवकुश दीक्षित का गीत टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेईमनवा सुनाने का आग्रह किया था। मैं पहले भी इस गीत को लवकुशजी की आवाज में ही पॉडकास्ट कर चुका हूं। लेकिन उस समय जिस मुफ़्तिया साफ़्टवेयर का प्रयोग किया था वह बाद
 
फ़ुरसतिया
Feb 15 2010 11:07 PM
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बसन्त राजा फ़ूलइ तोरी फ़ुलवारी!

हम इधर काम की कमी के चलते जरा बिजी जैसा कुछ हो गये। इस बीच देखते हैं कि ससुरा बसन्त आकर छा गया है। लोग बिना स्माइली लगाये हंसी-मजाक की बातें करने लगे हैं। चुहलबाजी के भाव चमक गये हैं। जैसे कोई ब्लॉगर ब्लॉगिंग छोड़ने के बाद लोगों के अपनापे के चलते [...]
 
फ़ुरसतिया
Feb 14 2010 11:45 AM
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…अथ कोलकता मिलन कथा

पिछ्ले दिनों कोलकता जाना हुआ। हल्का सा अचानक। हल्का सा अचानक इसलिये जाने के एक हफ़्ते पहले ही दो दिन की एक ट्रेनिंग के लिये हमें सिटी ऑफ़ जॉय जाने को कहा गया। हम तुरंत तैयार हो गये। दुर्योधन के बायोग्राफ़र और चौपटस्वामी प्रियंकरजी को इत्तला दे दिये कि आ रहे
 
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बसंत पंचमी पर निराला जी के बारे में

[आज बसंत पंचमी को निरालाजी का जन्मदिन मनाया जाता है। इस मौके पर पहले यह लेख फ़िर से पोस्ट कर रहा हूं- निरालाजी को विनम्रता पूर्वक याद करते हुये। मास्टर साहब की टिप्पणी ( आज बसंत पंचमी पर सामयिक लगा यह लेख सो खिंचे चले आये ! जानकारी मिली ! आभार!) ने इसके
 
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नये साल में और गये साल में कुछ मुलाकातें

गुलाबी शहर में मिलना कुश और लविजा के पापा से बीता साल मजेदार बीता। तमाम अच्छे अनुभव जुड़े। उनके बारे में फ़िर कभी विस्तार से लिखेंगे। फ़िलहाल आप गये साल और नये साल के कुछ फ़ोटो देखिये। गये साल के आखिरी दिनों में राजस्थान में जयपुर, जोधपुर, अजमेर ,पुष्कर जाना
 
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…..जिंदगी धूप तुम घना साया

सर्दी में चीजें सिकुड़ जाती हैं। यह बात हम तब से जानते हैं जब हमने हाईस्कूल भी नहीं पास किया था। हालांकि यह बात वे भी जानते हैं जिन्होंने कौनौ स्कूल कभी भी नहीं पास किया। सर्दी में लोगों को सिहरते-ठिठुरते भी देखा है। अभी जब यह लिख रहा हूं तो लग रहा है
 
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कविता-फ़विता, ब्लॉगर से मुलाकात और मानहानि

आप कुछ कविता-फ़बिता लिखते हैं:दो दिन पहले गौतम राजरिशी ने एस.एम.एस. करके सूचना दी कि मासिक पत्रिका परिकथा में हमारे ब्लाग का जिक्र है। फोन करके पता किया उनसे तो पता चला कि परसाईजी के बारे में संस्मरण वाली पोस्ट का जिक्र था उसमें। शाम को पत्रिका खरीद क
 
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…मेरी पोस्ट के अर्थ अनेकों हैं

सुबह-सुबह बच्चे को स्कूल  के लिये बस तक छोड़ने गया था। देखा तो सूरज भाई साहब गोल-गोल टिकिया से खुले में खिले थे। सोचा कि मोबाइल लाये होते तो एक तो फ़ोटॊ खैंच लेते और सटा देते यहां ब्लाग में। फ़ोटो और साथ में कविता भी सटा देते  एक ठो कोई जिसमें
 
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चिट्ठाचर्चा के बहाने कुछ और बातें

नये चर्चाकार साथी चिट्ठाचर्चा से संबंधित पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था–“चिट्ठाचर्चा के बारे में आपकी प्रतिक्रिया, सलाह,सुझाव, आलोचनायें आमंत्रित हैं। अगली पोस्ट में मैं कुछ सवाल जो पहले उठाये गये हैं उनके बारे में चर्चा करूंगा।” प्रतिक्रिया, सल
 
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चिट्ठाचर्चा ;यादों का एक सफ़र

चिट्ठाचर्चा के चर्चाकार j अनूप शुक्ल
 
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इति श्री इलाहाबाद ब्लागर संगोष्ठी कथा

इलाहाबाद ब्लागर संगोष्ठी सम्मेलन की लानत-मलानत अपने आखिरी दौर में है। मामला आखिरी सांसें ले रहा है। आई.सी.यू. में है। कभी भी दम तोड़ सकता है। इससे पहले कि मामला आखिरी सांस ले, सोचते हैं कि हम भी इसके अंतिम दर्शन कर लें। बाद में तो फ़ोटुयें रह जायेंगी
 
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इलाहाबाद के कुछ लफ़्फ़ाज किस्से

और इस तरह इलाहाबाद में ब्लागर संगोष्ठी संपन्न हुई। शानदार अनुभव हुये। लोगों से मिले-मिलाये। घूमे-घुमाये। गपियाये। हंसे-ठठाये। लौट के आये। अब आप इसे हमारी बेशरमी कहें या संवेदनशीलता या फ़िर हमारे लिये किये गये तथाकथित शानदार वीआईपी टाइप इंतजाम की कृप
 
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ब्लागर समारोह का उद्घाटन और सत्यार्थ मित्र का विमोचन

और ये शानदार टाइप उद्घाटन हो गया। नामवर जी दीप जला चुके हैं। ज्ञानजी विषय प्रवर्तन कर चुके। रवि भाई ब्लाग की जानकारी दे चुके। अजित भाई सत्यार्थ मित्र के बारे में बता चुके। किताब विमोचित हो चुकी। किताब के बारे में दो लोग बता चुके यह कहते कि उन्होंने
 
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नयी तकनीक, मोबाइल और तलवार से तेज सरपत

लुटना तकनीक के नाम पर कहावतें कोई ऐसे ही नहीं बनाई गयी हैं। सच तो यह है कि वे बनाई कहां गयीं हैं वे तो समय की सच्चाई के फ़ोटो-सोटोग्राफ़ टाइप चीजें हैं। हम जुमा-जुमा एक महीने पहले हम बड़े उचके-उचके घूम रहे थे कि हमने लिखा था: उपहार घर वाले देने पर अड़े थ
 
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सटकर बैठा चांद एक दिन मम्मी से यह बोला

चिठेरा-चिठेरी काफ़ी दिन बाद मिले थे। आपस में बातचीत करने के पहले उन्होंने एक-दूसरे की असलियत पहचानने के लिये पहले से तय पासवर्ड वाक्यों का आदान-प्रदान किया। चिठेरी:उधार प्रेम की कैंची है! चिठेरा:यह प्रेम के रिश्तों को काटती ही नहीं संवारती भी है। 
 
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सीजर हम अब भी तेरे साथ!

विवेक सिंह ने कालजयी कविता ब्रूटस ! तुम भी इनके साथ ? लिख डाली आज। आज हमारे दफ़्तर में ब्रूटस आया और ये कविता देकर निकल लिया। हमसे कहा कि अपने ब्लाग पर काहे नहीं पोस्ट करते! बोला आप कर दो अपने ब्लाग पर। जब अपना ब्लाग बनायेंगे तो पोस्ट करेंगे। [...]
 
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….भेजे क्यों मीठे सपने

रात सो गये थोड़ा जल्दी, हालांकि थके नहीं थे ज्यादा, तीन हीरोइनें ले गयीं, हमसे सपन-मिलन का वादा। हमने उनको बहुत बताया, हैं बहुत बिजी हम भईया, बात न मानी वे सुंदरियां, बोली मत करो निराश फ़ुरसतिया॥ बात बताई श्रीमती को, फ़िर तो उनकी खिलखिल गूंजी, चले खरीदन
 
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तुम कौन सी शाख के मोर हो जी

कल सुबह दक्षिण भारत की तबाही के सीन टेलिविजन पर देखे। जगह-ए-तबाही से इत्ती दूर फ़िर भी देखकर लगा कि कुदरत भन्नाई हुई है। कोई भन्नाया हुआ आका तबादले में किसी को कहीं किसी को कहीं पटक देता है। तबादलित कर देता है। वैसे ही प्रकृति भी मनमौजी है। पानी मांग
 
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