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ई-स्वामी

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29 May 2010
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ई-मेल बाँची बाप ने पड रहा दिल का दौरा, पूत ट्विट्टतो जावे!

इन्टरनेट पर अपने मनपसंद काम करने के चक्कर में यदि कोई परिवार के सदस्यों को तवज्जो नही दे रहे हैं तो ये याद रखना कि किसी दिन इसी पीसी के सामने ई-मेल पढते पिता दिल का दौरा पड रहा होगा और एक औलाद उसका यूट्यूब वीडियो बना रही होगी और दूसरी मित्रों को ट्विट्टर
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जौन एलिआ की याद में उन्ही की एक गज़ल

जौन एलिआ को सुन कर एहसास हुआ, जो मीर और मिर्ज़ा से ले कर तमाम नाकाबिले-इंदिराज़ कह गए वो नासिर्फ़ नाकाफ़ी था बल्कि कई बरसों ऐसा कितना कुछ वो सुन कर हम वाह-वाह किया किये जो दर-अस्ल नाकाबिले-दाद था!
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दुआ है कि तुम्हें तुम जैसे अजीब लोग मिलें!

खलील जिब्रान कहता है कि ‘हम अपनी खुशियाँ और ग़म अनुभव करने के बहुत पहले ही उनका चुनाव कर चुकते हैं!’ ऐसा लगता नहीं की यूँ मैने किया हो लेकिन शायद ऐसा होता हो या इस सत्य का भावार्थ अनुभव करना बाकी हो! हाँ, हर प्रेम करने वाले ने इस बात का चुनाव ज़रूर किया
टैग: फ़लसफ़े
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अजन्मे भूत की नज़र से भविष्य की कलाएं

कुछ कलाएं ऐसी हैं जो जन्मी तो पश्चिम मे हैं लेकिन यदि उन्हे भारतीय स्पर्श मिले तो मामला ही कुछ और होगा! ये लेख ऐसी ही कलाओं के बारे मे है.
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भाषा प्रवाह मतलब “मन का रेडियो बजने दे ज़रा!”

वैचारिक प्रवाह लहर है उसकी अपनी गतिक ऊर्जा है जिसमे बहना होता है! फ़िर जब शब्दों और भावों का कनेक्शन जुड जाता है – अभिव्यक्ति का बल्ब का जल जाता है. फ़िर उसमे आप बाकी तानें-मुरकियां (रस/उपमाएं/अलंकार) मिला सकते हैं. मैने भी की हैं कुछ कोशिशें.
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सचिन!

अगस्त २००८ में सचिन एक दिवसीय बल्लेबाजों की सूची में नीचे खिसकते-खिसकते २३वें क्रमांक तक जा पहुंचे थे. तब उनके लगातार गिरते प्रदर्शन के चलते मैने हताश और निराश ही हो कर एक लेख लिखा था “सचिन तेंडुलकर, अब बस कर!” जिसमें कहा था की लगातार खराब प्रदर्शन स
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चिट्ठाचर्चा: ये दुरूह आत्मपीडक कर्म कर कैसे लेते हैं आप?

आज जब चिट्ठाचर्चा की तुलना देसीपंडित से करता हूं तो पाता हूं कि आज अंग्रेजी वालों के पास भी इसकी टक्कर का कोई उपक्रम मौजूद नही है!
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अंग्रेजी चिट्ठा उपलब्ध

बहुतेरे हिन्दी चिट्ठाकारों के अंग्रेजी चिट्ठे हैं. महाजनो येन गत: स: पन्था का अनुसरण करते ऐसा करने का मन तो बन ही चुका था, समय रहते यह काम भी हो ही गया. जैसा कि होता है, एक छोटी व्यक्तिगत पोस्ट से आगाज़ कर दिया है. विविधता बढने व कलेवर और निखरने मे ज्
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इलाहबाद चिट्ठाकार संगोष्ठी: बधाईयां! शर्म तो बेच खाई, ये तो लफ़्फ़ाजियों का समय है!

इलाहबाद: २३/२४ नबंबर - एक अस्सी साल के कलमघुसेडू द्वारा हिन्दी चिट्ठाकारी की अस्मिता के साथ बलात्कार! कई हंसते-खिलखिलाते बरिष्ठ चिट्ठाकार इस कृत्य में सहयोग करते पाए गए!
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ट्विट ट्विट..फ़िल्म समीक्षा..ट्विट ट्विट ट्विट!

वॉट्स योर राशी" फ़िल्म देखते हुए समीक्षा भी कर रहा हूं. ये लेटेस्ट स्टाईल है भैये! जम कर पल-पल की ट्विट्टिंग करो – अपने जीवन को रीपोर्ट करने के चक्कर में चाहे उसका मजा ही खो दो! ट्विट.. ट्विट.. ट्विट..!
Oct 15 2009 05:34 AM
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पांच रुप्पैय्या बारा आना: चिट्ठे पर विज्ञापन, प्रायोजक या दानपेटी?

एक पडताल - चिट्ठों पर विज्ञापन लगाने के क्या विकल्प हैं? इस माहौल में चिट्ठाकारी का औचित्य भी क्या है?
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‘ओबामा को शान्ति नोबल’ अमरीकी नेतृत्व का छवि प्रबंधन?

आज ओबामा की आस्तीन पर नोबल शान्ति पुरुस्कार का बिल्ला चमकाना एक कूटनीति जरूरत है अन्यथा इनके बढाए हाथों से कोई मरहम तो क्या जहर ना ले!
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गांधी के इफ़ेक्ट्स और साईड-इफ़ेक्ट्स

ओबामा और गूगल को आज गांधी याद आए हैं – वही गूगल जो हिन्दी में टेक्स्ट एड व्यवसाय नही करता! वही ओबामा जो लगतार पाकिस्तान को सामरिक मदद देते आ रहे हैं. ये है गांधी की सही-सही प्रासंगिकता!
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प्रस्तुत है टंकी चालीसा और टंकी नामावली भी!

॥ टंकी चालीसा ॥ नमो नमो टंकी टंकारिनी। नमो नमो सनकी धारिनी ॥ धाई चढे सब सीढी तेरी। दारू,वीरू मौसी मती फ़ेरी॥ सब पर भारी टंकी माई। उतरे वीरू बसन्ती पाई॥ तेरी शरण होली गाई। गब्बर की फिर बैंड बजाई॥ व्यथा विवाह की वीरू बोले। उस प्रताप से बनगी शोले॥ तुझ बि
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ज्योतिषी अक्सर बदहाल क्यों होते हैं?

अक्सर ज्योतिषी इस बात की शिकायत करते पाये जाते हैं कि अपनी विधा के प्रति प्रेम के चलते वे आर्थिक उन्नति नहीं कर पाए. अक्सर ज्योतिषियों पर यह दोषारोपण भी होता है कि वे धनोपार्जन हेतू आमजन में भ्रांतियां फ़ैलाते हैं – जो कि बहुत हद तक सही भी है. समझदार
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‘क्यूं पीते हो इतना की बर्दाश्त ही ना कर पाओ?’ ‘कौन कम्बख्त बर्दाश्त करने के लिये पीता है?’

सीन देवदास फ़िल्म से है : चंद्रमुखी: “क्यूं पीते हो इतना की बर्दाश्त ही ना कर पाओ?” (अर्थात्: सदती नहीं है तो पीता क्यों है बेवडे?) देवदास: “कौन कम्बख्त बर्दाश्त करने के लिये पीता है, हम तो पीते हैं कि यहां बैठ सकें, तुम्हें देख सकें, तुम्हें बर्दाश्
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‘मौन‍म् सर्वार्थ साधन‍म्’ (तुम स्वयं को स्वामी क्यों कहते हो ई-स्वामी?)

अहंकार का विष साधुओं को भी नहीं छोडता. तुलसीदास, कबीर, रैदास आदी सब अपनी रचनाओं में कहीं ना कहीं अपने नाम डाल कर छोड गए - ‘…देख कबीरा रोया’ ‘…तुलसीदास सदा हरि चेरा’ ‘बुल्ला की ज़ाणां मैं कौंन..’ नाम का अहंकार क्यों होना चाहिए? क्या उन्हें ये चिन्ता क
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साहित्य वो बासी चिट्ठा है जो कागज़ पर प्रकाशित किया जाता है

मैं देसी सृजनात्मकता के आगे नतमस्तक हूं. जो बवाल दुनिया में और कहीं आकार नहीं ले सका वो हमारे यहां साकार हो गया है. दुनिया भर की भाषाओं में साहित्य के बारे में ब्लाग बने, साहित्यकारों के ब्लाग बने; पर किसी ने ये सवाल नहीं किया की “जी ये ब्लाग भ
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सविता भाभी तक कैसे (न) पहुंचें?

भारत से इन्टरनेट सेवाओं का प्रयोग करने वाले सुधी पाठक जानते ही होंगे की भारतीय भाषाओं की प्रथम सॉफ़्ट-पॉर्न कॉमिक चरित्र पर आधारित सविता भाभी [savitabhabhi.com] नामक साईट को भारत सरकार नें बैन कर दिया है – अर्थात भारत में रहने वाले लोग इस साईट को अपन
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राक्षसों का गुरु शुक्र शुभ है क्योंकि वह पार्वती का पुत्र है!

संदर्भ: अरविंद मिश्राजी ने अपने ब्लॉग पर उत्सुकता जताई थी की राक्षसों का गुरु शुक्राचार्य शुभ क्यों माना जाता है? इसके उत्तर में ज्योतिष दर्शन वाले सिद्धार्थ जोशी जी नें एक पोस्ट भी लिखी थी. उन्होंने इस पोस्ट में शुक्र के शुभ माने जाने के सामाजिक संद
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ये दिल्ली है मेरे यार: तांत्रिक, किताबें, सडकें और… चिडियां!

एक तांत्रिक से भेंट और कन्फ़्यूजन्निज़्म: किसी काम से दिल्ली गया था. एक तांत्रिक से खास तौर पे मिलवाया गया. मेरी तरह आप भी शायद सोच रहे होंगे की श्मशानों में रहने वाला भस्म मले दिगंबर अघोरी होगा. या काला चोगा और ढेर सारे रूद्राक्ष पहने घूमने वाला कोई द
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स्माईली: बहार आई तो खुल गए हैं नए सिरे से हिसाब सारे!

अगर देखने को फ़ैज़ की नज़र ना मिलती उधार, तो वैसा नहीं आता, जैसा खूबसूरत आया है बसंत. ज़रा ग्लोबलवार्मिंगग्रस्त इस सुंदर बसंत में अच्छी भली साहित्यिकता मौज लेने वालों की तत्काल सृजनशीलता की शिकार हो रही है! चलिए तो हम क्यों पीछे रहें.. एकाध नज़्म का शिकार
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अधिकतर जीनियस बंदों की आम परेशानी - लिखाई!

दुनिया कें सबसे ज्यादा टेलेन्टेड लोग बाएं हाथ का प्रयोग करने वाले लोग हैं. ये संयोग नही है. सिकन्दर से ले कर गांधी तक और आईंस्टाईन से ले कर ओबामा तक लिस्ट इतनी लंबी है की आप दांतो तले उंगली दबा लेंगे. अधिकतर जीनियस लोग खब्बू हैं या यूं कहें की जब जीन
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अगर हम बनाएं उनकी शक्लें?

अगर हम बनाएं एक फ़िल्म, अमरीका के एक छोटे से झूठ पर, जिसके दम पे नेस्तनाबूद कर दिया गया एक बसा बसाया मुल्क, लूट ली गई उनकी मिलियतें और मार दिये गए लाखों मासूम ईराकी. फ़िल्म में हों खालिस अमरीकी और ब्रिटिश किरदार - गोलियां चलाते सैनिक, गोले बारूद बेचते
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रोज़ सुर्ख़ियो में रहने वाले ब्लॉगर्स चुप क्यों हो जाते हैं?

शायद यह पढ कर जवाब मिले - स्त्री-विमर्श/वेलेंटाईंस/संस्क्रीती/स्वतंत्रता के गड्ड-मड्ड का सहारा लें? वीडियो देखिये . विज्ञापन में सेक्सी नारी अपने अंतर्वस्त्र को उतार कर गूलेल के समान उछालती है. सीढियों पर चढती वो कपडे बदलने जा रही है. उछाली गई अंगिया
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चार साल पूरे!

हिंदी चिट्ठाकारी से जुडे हुए चार साल पूरे हुए! एक उल्टी रवायत सी है - बल्लेबाज सैकडा मारने पर बल्ला ऊंचा कर के उन्मादे दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करता है जबकि चिट्ठेबाज पहले हाथ ऊंचे कर के घोषणा करता है - ”फ़लां साल पूरा” फ़िर कस्टमरी टिप्प
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दो सौ बारह = एक सौ तीन!

एक आदमी ट्रेन में यात्रा कर रहा था. एक स्टेशन पर दो लोग चढे..कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद - पहला बोला “नंबर ४५” दूसरा हंसते हंसते बेहाल हो गया. दूसरा बोला “नंबर ५९” फ़िर दोनो हंसते हंसते दोहरे हो रहे हैं. फ़िर पहला बोला
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अमिताभजी और मेरे सेलेब्रिटी स्टेटस के साईड इफ़्फ़ेक्ट्स!

डॉ. अमर को बिग बी उनके अपने कबीले के नहीं लगते , यानी मैं भी उन्हें अपने कबीले का नहीं लगता ( बिग बी और मैं एक ही कबीले के हैं ). वैसे बिग बी और मैं, डॉ. अमर को अपने कबीले के लग भी नहीं सकते.. हम अपनी उदारता और ओढी हुई इन्क्लूसिवनेस के चलते आम आदमी क