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भोर सृजन संवाद

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27 May 2010
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जनगणना से जात हटाओ

तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा| उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी
 
प्रदीप मिश्र
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भगत सिंह की याद में उनकी शहादत के 75 वर्ष पूरे होने पर

ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फाँसी दी तो वे केवल तेईस साल के थे। लेकिन आज तक वे हिन्दुस्ता न के नौजवानों के आदर्श बने हुए हैं। इस छोटी सी उम्र में उन्होंने जितना काम किया और जितनी बहादुरी दिखायी, उसे केवल याद कर लेना काफी नहीं है। हम
 
प्रदीप मिश्र
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कहानी लदुना के पानी की...

पानी तेरे कितने रंग पूरे देश-प्रदेश की भांति मंदसौर जिले ने भी पानी के गंभीर संकट को भोगा है, परन्तु इस ऐतिहासिक जिले के समाज ने जल संघर्ष की प्रक्रिया में नये-नये मुकाम हासिल करके अपनी विशेषता को सिद्ध कर दिया है। सूखे – अकाल के दौर में मंदसौर में दो सौ
 
प्रदीप मिश्र
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भोर सृजनसंवाद अंक छः

जनता ने अपना फैसला खुद किया लेखक - डॉ. वेदप्रताप वैदिक पाँच राज्यों के चुनाव-परिणामों ने यह सिद्ध किया है कि भारत का लोकतंत्र काफी परिपक्व होता जा रहा है। किसी भी लोकतंत्र को कमजोर करनेवाले जितने भी तत्व हो सकते हैं, इन चुनावों ने उनको पराजित किया है
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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भोर सृजन संवाद अंक छः

नाम : प्रमोद कुमार जन्म : ३ जनवरी १९५७, बिहार,सीवान जिले, के बिलासपुर गाँव में । शिक्षा : बी०एससी०, सम्प्रति: स्वतंत्र लेखन एवं आई० एस० ओ० कंसलटेंट। सृजन: पहला लेख १९७२ में। लगभग एक दर्जन लेख प्रकाशित। पहली कविता १९७७ में छपी तब से कविताओं का निरंतर
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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भोरसृजन संवाद-5

भोरसृजन संवाद अंक-5 इंदौर,10 अक्टूबर 2008 सम्पादकीय, मित्रों भोर जब होती है, खिड़कियाँ खुलतीं हैं। खिड़कियों से उतरती हुई भोर, फिर आपके सामने है। रामविलास शर्मा हमारे समय का एक ऐसा व्यक्तित्व है, जो हिन्दी समीक्षा में कई खिड़कियाँ खोलता है। उनके जन्म
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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ईश्वरी सत्ता पर शोध पत्र

मोहल्ला पर टहल रहा था तो भाई निरंजन श्रोत्रिय और आकांक्षा से मुलाकात हो गई दोनों ईश्वर की पहेली में उलझे पड़े थे। अचानक मुझे मेरी एक कविता याद आगयी सो यहाँ रखा रहा हुँ। कुछ बातें ईश्वर के नाम पर ही। प्रदीप कांत ने एक फोटो खींचा था, उसे भी चिपका रहा ह
 
प्रदीप मिश्र
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मानव सभ्यता का विकास -7

खेतों के काम करने वालो दासों को गरम लोहे से दाग दिया जाता था जिससे कि वे सदा पहचाने जा सके कि किस मालिक के हैं। रात को भेड़-बकरियों की तरह वे बाड़ों में बन्द कर दिये जाते थे और भूखे जानवरों की तरह सबरे खेतों में हाँक दिये जाते थे। युद्ध से गुलामों की
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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हमारे समय का धिनौना सच दिल्ली हदसा

पिछले दिनों दिल्ली में जो कुछ हुआ उसे हम सबने खूब जाँचा-परखा। निर्णय यह लिया गया कि मुसलमानों ने तबाही मचा दी है। सिमी और न जाने क्या-क्या। लेकिन सिमी को वजूद में आने और पैदा करने में किसका हाथ है ? और भविष्य किस दिशा में है ? कहीं हम एक आँख के चश्मे
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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मानव सभ्यता का विकास -6

ईसा से लगभग पाँच हजार साल पहले मिस्त्र की प्राचीन संस्कृति का विकास हुआ। नील नदी की बाढ़ के कारण यहाँ की उर्वर धरती में जिस संस्कृति का विकास हुआ, उसका गहरा असर भुमध्यसागर के प्रदेशों पर पड़ा। यह प्राचीन संस्कृति बर्बर और अर्ध-बर्बर अवस्था की है। लोह
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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मानव सभ्यता का विकास -5

अंग्रेज पहले भारत में व्यापार करने आये थे, यहाँ का माल अपने वहाँ बेचकर मुनाफा कमाने आये थे। लेकिन अपने यहाँ की औद्योगिक उन्नति के साथ-साथ उन्होंने भारत के उद्योग-धंधों का नाश किया। १८ वीं सदी के अन्त तक भारत के रेशमी और सूती कपड़े अंग्रेजी बाजार में
 
प्रदीप मिश्र
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मानव सभ्यता का विकास -4

यह वर्ण-व्यवस्था मानव समाज के भावी विकास के लिए आवश्यक थी। इससे एक वर्ग ऐसा बना जो अवकाश-भोगी था और अपना समय गणित, ज्योतिष, साहित्य, व्याकरण आदि के विकास के लिए दे सकता था। वर्ण-व्यवस्था के कारण धर्म शास्त्र, साहित्य, दर्शन और विज्ञान का विभाजन हुआ।
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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मानव सभ्यता का विकास -3

एथेन्स में दासों की संख्या स्वाधीन यूनानियों से बहुत ज्यादा थी। इनके श्रम के बल पर ही यूनान की सभ्यता का प्रकाश फैला था। एथेंस के कारखानों में ये दास ही काम करते थे। इसलिीए यह स्वाभाविक था कि व्यापारी और औद्योगिक वर्ग उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए
 
प्रदीप मिश्र
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तुम्हे प्यार करते हुए

तुम्हे प्यार करते हुए तुम्हारे आकाश में जिद्दी परिंदे की तरह उड़ रहा हूँ जानता हूँ लौट आना है इस दुनिया में जिसे मैं चाहता हूँ तुम्हे प्यार करते हुए यहाँ करोड़ों चीजों के कसमसाने की आवाज उनके टूटने बिखरने का सिलसिला बनाता है जगह हमारे बीच अलग नहीं है
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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हिजाबों से दूर रहने वाला शायर – अहमदफ़राज़

तू खुदा है न मेंरा ईश्क फरिश्तों जैसा दोनो इन्साँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें इन्सान को इन्सान से इन्सान के सलीके से मिलाने की बात करता ये शेर दुनिया के सबसे मशहूर और मकबूल शायरों में से एक अहमद फ़राज़ का है। १९४७ में भारत को आज़ादी तो मिल गई
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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हमारे समय से उम्मीद

अभी कल ही संसद की भयानक और शर्मसार करनेवाली कार्यवाही से रूबरू हुआ और आज समय के उम्मीद पर कुछ कहना अत्यन्त कठिन है। क्योंकि हम जिस वर्तमान में जी रहे हैं, उसका भविष्य मनुष्यों का भविष्य नहीं है। कुछ अजीब किस्म की सभ्यता की तरफ बढ़ रहे हैं, जहाँ सामने
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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अधिकारी-नेता-कलर्क सबने

मेघराज (एक) गृहणियों ने घर के सामानों को धूप दिखाकर जतना दिया है छतों की मरम्मत पूरी हो चुकी है नाले-नालियों की सफाई का टेंडर पास हो गया है अधिकारी-नेता-कलर्क सबने अपना हिस्सा तय कर लिया है और तुम हो कि आने का नाम ही नहीं ले रहे हो चक्कर क्या है मेघर
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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मानव सभ्यता का विकास -2

प्राचीन संस्कृतियों में भारत की सिन्धु घाटी की सभ्यता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। ``मोहेज्जोदड़ो और सिन्धु घाटी की सभ्यता`` (१९३१) में सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि पुरातत्व की खोज से चौथी सहस्त्राब्दी ई. पू. के जीवन का ही पता चलता है ``लेकिन मोहेज्जो
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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मानव सभ्यता का विकास

मनुष्य ने युगों-युगों तक अपार यातनाएँ सहकर आज की सभ्यता को जन्म दिया है। यातना अधिकांश जनता के भाग्य में पड़ी, उस यातना से सुख उठाना थोड़े-से सम्पत्तिशाली लोगों के हाथ में रहा। यह युग मानव-समाज के विकास में एक विराट परिवर्तन का युग है। शोषण और ध्वंस
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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देवेन्द्र कुमार बंगाली का गीत

एक पेड़ चांदनी एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने फूले तो आ जाना एक फूल मांगने ढिबरी की लौ जैसे लीक चली आ रही बादल रोता है बिजली शरमा रही मेरा घर छाया है तेरे सुहागने तन कातिक मन अगहन बार-बार हो रहा मुझमें तेरा कुआर जैसे कुछ बो रहा रहने दो यह हिसाब कर लेन
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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देवेन्द्र रिणवा की कविता

याद नहीं आता जैसे याद नहीं आता कि कब पहनी थी अपनी सबसे प्यारी कमीज आखिरी बार कि क्या हुआ उसका हश्र सायकल पोंछने का कपड़ा बनी छीजती रही मसौता बन किसी चौके में कि टंगी हुई है किसी काक भगोड़े की खपच्चियों पर याद यह भी नहीं आता कि पसीने में सनी कमाज की त
 
प्रदीप मिश्र
Dec 29 2009 11:48 AM
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दमन की घट्टी पीस रही इंसान

आज देश बहुत ही बुरी स्थिति से गुज़र रहा है, और इसकी वजह देश की जनता बिल्कुल नहीं हैं। देश को इस बुरी स्थिति में घसीट लाने वाले वे लोग हैं, जिन पर पिछले बाँसठ बरसों से जनता भरोसा करती आयी है। कभी-कभी उनके चेहरे, नाम और झण्डे भलेही बदले हों, पर नीतियाँ
 
प्रदीप मिश्र
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भाषा की लड़ाई की आड़ में

कांग्रेस को नये नये दैत्य पैदा करने और उनसे खेलने का पुराना शोक है। ये दैत्य पहले तो उसके अपने अंदर की कलह से पैदा होते और उन्हीं से निपटने के काम आते थे। चाहे भिण्डरांवाले हों या बाल ठाकरे। लेकिन इस बार मनसे का नया दैत्य उसने शिवसेना की काट के लिए प
 
प्रदीप मिश्र
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दीपक

एक) मिट्टी धरती से कपास खेतों से तेल श्रमिकों से और आग सूर्य से लिया उधार मनुष्यों ने बनाया दीपक जिसके जलते ही घोर अंधकार में भी जगमगाने लगी पृथ्वी लो हो गयी दिवाली। (दो) न जाने कौन सी धुन है जो जलाए रखती है इसको जलता रहता है अंधेरे के खिलाफ अंधेरा ज
 
प्रदीप मिश्र
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जिन्ना तो सिर्फ मिस्टर जिन्ना थे

क्या यह जरूरी है कि मोहम्मद अली जिन्ना को हम देवता मानें या दानव ! देव और दानव के परे क्या कोई अन्य श्रेणी नहीं है, जिसमें गांधी, जिन्ना और सावरकर जैसे लोगों को रखा जा सके? क्या अपने इतिहास के प्रति हम थोड़े निस्संग, थोड़े निष्पक्ष, थोड़े तटस्थ हो सकते
 
प्रदीप मिश्र
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लोकतंत्र का बखिया

बीस अप्रैल को अडवाणी जी के गाँधीनगर में अनहद, ऊर्जाघर और अमन समुदाय के 25 युवा कार्यकर्ताओं को घेर कर भाजपा के गुंडों ने खूब मारा-पीटा. लात-घूसे, थप्पड़-मुक्के, गालियाँ कुछ भी ऐसा नहीं था, जो उन नौजवानों को नही खाना पड़ा. ये 25 नौजवान एक प्रधान मंत्र
 
प्रदीप मिश्र
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हाथ से फिसलते समय के दुःख की कविताएँ

डर तरह-तरह के डिजाइनों में उपलब्ध थे / बाजार उन्हीं के बल खड़ा था / पिछड़ जाने का डर / सबकुछ चला रहा था / उसमें गति इतनी कि / कई पहिये गले रेतते निकल जाते / पर दिखते नहीं /..../ धर्म पर सवार था / उसकी भव्य मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा हो रही थी / ….
 
प्रदीप मिश्र
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प्रदीप कांत की ग़ज़लें

जन्म : 22 मार्च 1968 रावत भाटा (राजस्थान )। शिक्षा : स्नातकोत्तर (भौतिकी व गणित )। प्रकाशन : कथादेश ,इन्द्रपस्थ भारती, सम्यक, सहचर, अक्षर पर्व आदि लघु पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में ग़ज़लें व गीत प्रकाशित । सम्प्रति : प्रगत प्रौद्योगिकी केन्द्र में वै
 
प्रदीप मिश्र
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साल आया है नया

साल आया है नया फटे मोजे, पाँव की उँगली दिखाई दे रही साल आया है नया दुनिया बधाई दे रही! रोटियाँ ठंडे तवे पर आग पानी-सी लगे ज़िंदगी कब तक बताओ मेहरबानी-सी लगे बीतकर भी एक बीती धुन सुनाई दे रही! दूध-सा फटना दिलों का साल-भर जारी रहा हर नशा उतरा चढ़े बिन
 
प्रदीप मिश्र
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