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09 Jun 2010
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भारतीय भाषाओं के जरिए बनता नया इतिहास

उमेश चतुर्वेदी1994-95 की बात है। दिल्ली के तब के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना विदेश दौरे पर थे। उनकी गैरमौजूदगी में तब के शिक्षा और विकास मंत्री साहब सिंह वर्मा कार्यकारी मुख्यमंत्री की भूमिका निभा रहे थे। इस दौरान उन्होंने तय किया कि पब्लिक स्कूलों में
 
उमेश चतुर्वेदी
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वितंडा का ब्लॉग

उमेश चतुर्वेदीब्लॉग यानी वेब लॉग के बारे में माना जाता है कि इससे आम अभिव्यक्ति को नया आयाम मिला है। वर्चुअल दुनिया के इस अपूर्व माध्यम ने उन लोगों को भी अभिव्यक्ति के लिए ऐसा स्पेस मुहैया कराया है, जिनके विचारों और समस्याओं को आधुनिक मीडिया के पारंपरिक
 
उमेश चतुर्वेदी
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बदलाव की आहट

उमेश चतुर्वेदीअपने यहां जब भी किसी को प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं से इंसाफ नहीं मिलता, तो उसके पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। अदालतों से उन्हें इंसाफ भी मिलता है। संवैधानिक ताकत और रसूख रखने वाले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट
 
उमेश चतुर्वेदी
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एफ एम चैनल के कर्मचारी संघर्ष को तैयार

एफ एम सहित आकाशवाणी दिल्ली के विभिन्न चैनलों में काम करने वाले सैकड़ों उदघोषकों और कर्मियों में अधिकतर कलाकारों को पिछले ग्यारह महीनों से भुगतान नहीं किया गया है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें इससे भी अधिक समय से पैसे नहीं मिले हैं। इसके लिए श्रोताओं,
 
उमेश चतुर्वेदी
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suchanasansar

 
उमेश चतुर्वेदी
May 02 2010 04:00 PM
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कहां है लोक......

उमेश चतुर्वेदीलोक के बिना जिंदगी के रसधार की कल्पना नहीं की जा सकती। रोजाना की जिंदगी की टीस और उससे उपजी पीड़ा को स्वर देने का काम लोक की अपनी भाषा और उसका अपना साहित्य ही दे सकता है। लोक के दर्द की टीस को लोकसाहित्य इतनी खूबसूरती से अभिव्यक्ति देता है
 
उमेश चतुर्वेदी
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साहित्य और सत्ता के रिश्ते

उमेश चतुर्वेदीसंतन को सीकरी सों क्या काम... सत्ता और साहित्य के रिश्तों की जब भी चर्चा होती है, करीब साढ़े चार सौ साल पहले लिखी कुंभनदास की ये पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं। अकबर के दौर में जब कुंभनदास ने इन पंक्तियों की रचना की थी, तब के अधिकांश
 
उमेश चतुर्वेदी
Apr 14 2010 08:15 AM
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नागरी लिपि या रोमन हिंदी

उमेश चतुर्वेदी1957 में लखनऊ से प्रकाशित युगचेतना पत्रिका में रघुवीर सहाय की हिंदी पर एक कविता छपी थी, जिसमें उन्होंने हिंदी को दुहाजू की नई बीवी बताया था। राजनीतिक सत्तातंत्र के हाथों हिंदी की जो कथित सेवा हो रही थी, इस कविता के जरिए रघुवीर सहाय ने उसकी
 
उमेश चतुर्वेदी
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लंदन में मची 'फैसले ' धूम

लंदन के नेहरू केंद्र के सभागार में 18 मार्च को भारी हुजूम उमड़ा। मौका था मशहूर लेखिका और फिल्म निर्माता-निर्देशक रमा पांडे की किताब फैसले के लोकार्पण का। भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी पर बने टीवी सीरियल पर आधारित रमा पांडे की इस किताब में उन महिलाओं
 
उमेश चतुर्वेदी
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नहीं बदल रहा मीडिया का मिजाज

उमेश चतुर्वेदीटैम की रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी के मौजूदा पैमाने पर इन दिनों सवालिया निशान लगाने वालों में वे लोग भी शामिल हो गए हैं, जो हाल के दिनों तक इसके पैरोकार रहे हैं। इसके जरिए एक बार फिर से खबरों की बुनियादी संरचना और उसके विषय को लेकर गंभीर बहस
 
उमेश चतुर्वेदी
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अखबारों पर भरोसा बरकरार

उमेश चतुर्वेदीअमेरिका और यूरोप में जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार बढ़ता जा रहा है, अखबारों के प्रसार में गिरावट देखी जा रही है। इसके चलते वहां अखबारों के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगा है। चार साल पहले ब्रिटेन की पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित कवर स्टोरी-
 
उमेश चतुर्वेदी
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टैम की माया के सामने खुलते जिंदगी के राज

उमेश चतुर्वेदीमौजूदा प्रतिस्पर्धा में कुछ नया करके अपनी पहचान बनाए रखते हुए टीआरपी की दौड़ में अहम स्थान बनाए रखने की अंतहीन कवायद में मनोरंजन चैनल भी जुट गए हैं। इसके लिए हर चैनल नए-नए आइडिया को लेकर आगे आ रहा है। बुद्धू बक्से के पर्दे पर रियलिटी शो की
 
उमेश चतुर्वेदी
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नई सुबह की उम्मीद

यह लेख अमर उजाला में प्रकाशित हो चुका है। उमेश चतुर्वेदी हर बीते हुए लमहे की अपनी कुछ उपलब्धियां होती हैं तो कुछ असफलताएं भी होती हैं। जाहिर है दो हजार आठ ने भी कुछ कामयाबियां हासिल कीं तो कुछ नाकामयाबियों से भी उसे रूबरू होना पड़ा है। बीता हुआ जब इत
 
उमेश चतुर्वेदी
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मंदी का बहाना है ....

उमेश चतुर्वेदी कहते हैं दीपक तले अंधेरा होता है। इस कहावत का सबसे बेहतरीन नमूना इन दिनों मीडिया की अपनी खुद की दुनिया है। पीलीवर्दीधारियों (जेट एयरवेज की एयरहोस्टस की वर्दी) की खबर को मनमोहनी अर्थव्यवस्था के मुंह पर बड़ा तमाचा बताने वाले मीडिया वाला
 
उमेश चतुर्वेदी
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क्यों महान हैं गांधी ...

गांधी जी की महानता को लेकर आए दिन सवाल-जवाब और तर्क-वितर्क होते रहे हैं। ऐसे ही सवालों से लबरेज एक जर्मन जिज्ञासु युवती का सहारा समय उत्तर प्रदेश के सीनियर प्रोड्यूसर राजकुमार पांडेय का सामना हुआ तो उन्हें इसका जवाब खोजने के लिए काफी कवायद करनी पड़ी।
 
उमेश चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:44 AM
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निशाने पर रिपोर्टर ...

खबरिया चैनलों की बढ़ती दुनिया में पत्रकारिता में कैरियर बनाने की इच्छा रखने वाले नौजवानों को सिर्फ और सिर्फ चमक-दमक ही नजर आती है। लेकिन इसके पीछे भी एक स्याह और मटमैली दुनिया है। रिपोर्टरों की मजबूरी है कि वे घटना का सीधा कवरेज करें। ना करें तो बॉस
 
उमेश चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:44 AM
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अब नौसिखुओं का कौन खयाल रखेगा...

वाराणसी के पत्रकार सुशील त्रिपाठी की असामयिक मौत सहारा समय उत्तर प्रदेश चैनल के सीनियर प्रोड्यूसर राजकुमार पांडेय के लिए व्यक्तिगत क्षति है। सुशील जी उनके गुरू भी रहे हैं और हम-प्याला, हम-निवाला मित्र भी। राजकुमार पांडेय ने अपने इस मित्र, गुरू और हमद
 
उमेश चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:44 AM
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नहीं रहे मस्तमौला बाबा

उमेश चतुर्वेदी भड़ास मीडिया पर प्रकाशित इस रिपोर्ट को हूबहू हम प्रकाशित कर रहे हैं। सुशील त्रिपाठी से मेरी भी जानपहचान थी। भाई राजकुमार पांडे के जरिए मैं बाबा से कुल जमा तीन बार मिल पाया था। लेकिन हर मुलाकात में मेरा सामना एक मस्तमौला बनारसी से हुआ।
 
उमेश चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:44 AM
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भदेसपन की बुद्धू बक्से में प्रभावी दस्तक

उमेश चतुर्वेदी बुद्धू बक्से के पर्दे पर बिहार और उत्तर भारतीय हिंदी भाषियों को अब तक दरबान, चपरासी और मजाक का पात्र बनते रहे उत्तर भारतीय हिंदीभाषी अब कहानियों के केंद्र में हैं और मजे की बात ये है कि इनकी उपस्थिति अब टीआरपी की दौड़ में सफलता की गारं
 
उमेश चतुर्वेदी
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ह्वाइट हाउस में हिंदी का जयघोष

उमेश चतु्र्वेदी हिंदुस्तानी महानगरीय उपेक्षाबोध के बीच लगातार ताकतवर बन रही हिंदी ने ह्वाइट हाउस तक में दस्तक दे दी है। इस दस्तक का जरिया हमारे अपने राजनेता या हिंदीभाषी हस्तीन नहीं बने हैं। दुनिया के सबसे बड़े सत्ता के केंद्र ह्वाइट हाउस में हिंदी क
 
उमेश चतुर्वेदी
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अंधेरे खोह में भटकती पत्रकारिता शिक्षा

उमेश चतुर्वेदी तकनीकी शिक्षण का अपना एक अनुशासन होता है, उसकी अपनी जरूरतें होती हैं। यही कारण है कि इंजीनियरिंग और मेडिकल की ना सिर्फ शिक्षा हासिल करना, बल्कि उनकी शिक्षा देना बेहद चुनौतीभरा काम माना जाता रहा है। अब प्रबंधन की शिक्षा के साथ भी वैसा ह
 
उमेश चतुर्वेदी
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नहीं रूक पाएगा हिंदी का कारवां

उमेश चतुर्वेदी सितंबर के महीने जैसे-जैसे नजदीक आता जाता है, सरकारी दफ्तरों के उस खास विभाग की रौनक बढ़ाने की कवायद शुरू हो जाती है, जिसे हिंदी अथवा राजभाषा विभाग कहा जाता है। ऐसे माहौल में हिंदी के पाखंड दिवस के करीब एक पखवाड़ा पहले केंद्र सरकार का
 
उमेश चतुर्वेदी
Sep 15 2009 07:33 PM
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अंदरखाने में भी हुई डील

उमेश चतुर्वेदीयह लेख प्रथम प्रवक्ता के 01 सितंबर 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ है। भारतीय लोकतंत्र में इस बात पर शक नहीं है कि इस देश का सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री का पद है। जाहिर है उन्हें नियंत्रित करने वाली पार्टियों के अध्यक्ष की ताकत भी कम नहीं होगी।
 
उमेश चतुर्वेदी
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निजीपन में सेंध यानी सच का सामना

उमेश चतुर्वेदीकड़वी सचाई का सामना बहादुर ही कर पाते हैं। बचपन से ही हमें ये बताया जाता रहा है। ये शिक्षा हमें देते वक्त इस बात की भी ताकीद की जाती रही है कि जब तक उस सचाई के उजागर होने से व्यापक समुदाय का हित न जुड़ा हो, चाहे कितना भी कड़वी हकीकत क्यों
 
उमेश चतुर्वेदी
Jul 29 2009 07:56 PM
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बालिका वधू पर सवाल

उमेश चतुर्वेदी 14 जुलाई को लोकसभा में सवाल भर्तृहरि महताब का था...जवाब अंबिका सोनी ने दिया ...लेकिन उनका जवाब पूरा होने का जैसे जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव कर रहे थे। उन्होंने छूटते ही बालिका वधू पर शारदा एक्ट के उल्लंघन और इसके जरिए बाल विवाह को
 
उमेश चतुर्वेदी
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ये सीरियल कुछ खास है!

उमेश चतुर्वेदी हिंदी टेलीविजन की दुनिया में इन दिनों दो समानांतर धाराएं आगे बढ़ती नजर आ रही हैं। एक तरफ खबरिया चैनलों की दुनिया है, जहां पारंपरिक खबरों की सिमटती दुनिया का फिलहाल कोई तार्किक अंत होता नजर नहीं आ रहा है, जबकि दूसरी तरफ है मनोरंजन चैनलो
 
उमेश चतुर्वेदी
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अखबारों के खिलाफ उठी आवाज

उमेश चतुर्वेदी लोकसभा चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से पैसे लेकर खबरें छापने और अखबारी पैकेज न लेने वाले उम्मीदवारों की चुनाव प्रचार तक की खबरों को जगह ना देने का विरोध वरिष्ठ पत्रकार तो कर रहे हैं, लेकिन चिंता की बात ये है कि खुद पत्रकारिता में इसे ल
 
उमेश चतुर्वेदी
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पत्रिका चर्चा

नए अनुभवों से गुजरने की यात्रा उमेश चतुर्वेदी टेलीविजन चैनलों के विस्तार के इस दौर में साहित्यिक और सांस्कृतिक मंचों पर एक रोना सामान्य हो गया है। हर वक्ता को गंभीर पाठकों का अभाव हर समारोह में सालता रहता है। ऐसे स्यापे भरे माहौल में अगर 2009 ने नई उ
 
उमेश चतुर्वेदी
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शुरूआती पत्रकारिता के दिनों की एक याद

उमेश चतुर्वेदी मेरा अनुभव कुछ दूसरा है। 1996 की बात है, तब मैं शावक पत्रकार था, अमर उजाला ग्रुप के आर्थिक अखबार अमर उजाला कारोबार में मेरी नई-नई नौकरी लगी थी। तब के संपादक ने नौकरी देते वक्त मुझसे ट्रेड यूनियन और साहित्यिक-सांस्कृतिक रिपोर्टिंग कराने
 
उमेश चतुर्वेदी
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पुस्तक समीक्षा

इतिहास और निजता का संसार उमेश चतुर्वेदी इंटरनेट ने चिट्ठियों के संसार पर विराम लगा दिया..रही-सही कसर फोन और मोबाइल फोन ने पूरी कर दी। किसी का हालचाल जानना है तो पंडोरा बॉक्स काफी है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री
 
उमेश चतुर्वेदी
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किस करवट बैठेगी ब्लॉगिंग की दुनिया !

उमेश चतुर्वेदी ब्लॉगिंग पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने ब्लॉगरों के मीडिया के सबसे शिशु माध्यम और उसके कर्ताधर्ताओं के सामने धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। अपनी भड़ास निकालने का अब तक अहम जरिया माने जाते रहे ब्लॉगिंग की दुनिया सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले
 
उमेश चतुर्वेदी
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चुनावी माहौल का बदला-बदला नजारा

उमेश चतुर्वेदी चुनाव कार्यक्रमों का ऐलान करके चुनाव आयोग रेफरी की तरह मैदान में उतर गया है। उसे इंतजार है नियत तारीख पर चुनावी अखाड़े में उतरने वाले राजनीतिक दलों का..जो अखाड़े के नियम कायदे का पालन करते हुए अपने प्रतिद्वंद्वियों को पटखनी दे सकें। चु
 
उमेश चतुर्वेदी
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सियासी मैदान में इंटरनेट की दस्तक

उमेश चतुर्वेदी अमेरिका में हाल ही में हुए राष्ट्रपति चुनाव और भारत में होने जा रहे आम चुनाव में मंदी की छाया के अलावा और कोई समानता है तो वह है इंटरनेट का इस्तेमाल। 1969 में इंटरनेट के जन्म के बाद ये पहला मौका है – जब भारतीय चुनावों में इंटरनेट का जो
 
उमेश चतुर्वेदी
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क्या है इस राहत पैकेज का मकसद !

उमेश चतुर्वेदी लोहिया जी कहते थे कि दिल्ली में माला पहनाने वाली एक कौम है। सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन माला पहनाने वाली इस कौम में कोई बदलाव नहीं आता। आज अगर लोहिया जी होते तो वे देखते कि माला पहनाने वाली इस कौम की तरह सरकारी व्यवस्था और रवायत में को
 
उमेश चतुर्वेदी
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गैरजिम्मेदार टीवी रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार कौन ?

उमेश चतुर्वेदी तोप से मुकाबिल रहने वाले प्रिंट मीडिया की सारी तोपें इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर जोरशोर से निशाना साधे हुए हैं। वजह बनी है मुंबई में आतंकी हमलों की नाटकीय रिपोर्टिंग.. डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त से प्रिंट माध्यमों को भस्मासुरी अंदा
 
उमेश चतुर्वेदी
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क्यों चुप है चीन

उमेश चतु्र्वेदी जून 2003 में चीन की धरती पर तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जब कदम पड़े थे – तब ना सिर्फ भारतीय, बल्कि चीन के मीडिया ने भी दोनों देशों के बीच रिश्तों की नई इबारत लिखे जाने की भरपूर उम्मीद जताई थी। इस उम्मीद की वजह भी थी। 1962
 
उमेश चतुर्वेदी
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मीडिया के पन्ने या युद्ध का मैदान

उमेश चतुर्वेदी पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में आतंकी हमले के बाद अरब सागर में न जाने कितने ज्वार-भाटा आ चुके हैं। लेकिन एक सवाल का जवाब दोनों तरफ बड़ी बेसब्री से तलाशा जा रहा है कि युद्ध होगा या नहीं ....दोनों तरफ एक वर्ग ऐसा है, जिसे लड़ाई के ही सहा
 
उमेश चतुर्वेदी