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17 Jun 2010
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रमकलिया की जात न पूछो

BODY { MARGIN: 8px } .LW-yrriRe { FONT: x-small arial } कई दिनों से जाति के नाम पर विमर्श चल रहा है। इसी सन्दर्भ में अचानक ही अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई। ९० के दशक में इंदौर के साहित्यिक मित्रों के बीच यह काफी लोकप्रिय हुआ करती थी और गोष्ठियों में
 
Arun Aditya
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नोएडा में साहित्यिक जमावड़ा

तर्पण और उत्तर वनवास पर चर्चास्व. द्वारिका प्रसाद सक्सेना स्मृति न्यास के तत्वावधान में शिवमूर्ति के उपन्यास तर्पण और अरुण आदित्यके उपन्यास उत्तर वनवास पर आयोजित विचार गोष्ठी मेंआप सादर आमंत्रित हैं।दिनांक- रविवार, 7 मार्च, 2010समय - अपराह्न 2 बजेस्थान-
 
Arun Aditya
Mar 05 2010 06:31 PM
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डर के पीछे जो कैडर है

एम एफ हुसैन का आत्म निर्वासन हो, या तस्लीमा नसरीन का निर्वासन, सलमान रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा हो या सफदर हाशमी की हत्या...इनके जरिए फासीवादी शक्तियां सिर्फ इन व्यक्तियों को ही नहीं, अपने सोच से अलग सोच रखने वाले हर दिमाग को नियंत्रित करना चाहती हैं।
 
Arun Aditya
टैग: कविता
Feb 26 2010 06:21 PM
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उत्तर वनवास : नामवर सिंह और राजेंद्र यादव की राय

इसी 6 फरवरी को पुस्तक मेला प्रांगण में आधार प्रकाशन के स्टाल पर नामवर सिंह और राजेंद्र यादव ने मेरे पहले उपन्यास 'उत्तर-वनवास ' का लोकार्पण किया। अल्प सूचना पर दिल्ली जैसे बेदिल कहे जाने वाले शहर में जिस तादाद में मित्रों और शुभचिंतकों ने उपस्थिति दर्ज
 
Arun Aditya
टैग: novel
Feb 15 2010 10:21 AM
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समय न मिले तब भी आना

आजकल क्या लिख रहे हो?इस सवाल के जवाब में 'एक उपन्यास पर काम चल रहा है' कई वर्षों से मेरे लिए लिखने से बचने का एक खूबसूरत बहाना बना हुआ था। मित्रों ने घेराबंदी करके वह बहाना खत्म करवा दिया। लंबे समय से 'शीघ्र प्रकाश्य' बना रहा उपन्यास उत्तर वनवास अंतत:
 
Arun Aditya
टैग: novel
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जब इस तरह घना हो कोहरा

'कोहरा 'कविता द पब्लिक एजेंडा मैगजीन के ताजा अंक में छपी है। द पब्लिक एजेंडा से हिंदी के दो सुप्रसिद्ध कवि जुड़े हुए हैं। इसके संपादक मंगलेश डबराल और साहित्य संपादक मदन कश्यप हैं। कोहराकई दिनों से छाया हुआ है कोहरा घनाकंपकंपाती ठंड और सूरज का कहीं अता
 
Arun Aditya
टैग: कविता
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उत्तर वनवास के बारे में वरिष्ठ कथाकार संजीव की राय

उपन्यास उत्तर वनवास का आवरण तैयार हो गया है। वरिष्ठ चित्रकार-कथाकार प्रभु जोशी की पेंटिंग से सज्जित यह आवरण आपको कैसा लग रहा है, जरूर बताएं। उम्मीद है कि उपन्यास दिल्ली के पुस्तक मेले में आधार प्रकाशन के स्टाल पर उपलब्ध रहेगा। बहरहाल उपन्यास के आने से
 
Arun Aditya
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ठोकर तो पत्थर को भी लगती है

ठोकर हम अपनी रौ में जा रहे होते हैं अचानक किसी पत्थर की ठोकर लगती है और एक टीस सी उठती है जो पैर के अंगूठे से शुरू होकर झनझना देती है दिमाग तक को एक झनझनाहट पत्थर में भी उठती है और हमारे पैर की चोट खाया हुआ हत-मान वह शर्म से लुढ़क जाता है एक ओर एक पल
 
Arun Aditya
Dec 29 2009 11:51 AM
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शमीम फरहत को जानते हैं आप

उर्दू की लिपि में उनकी कोई किताब नहीं कुछ रंग थे। थोड़ी खुशबू थी। थोड़ी धूप थी, कुछ रूप था। इन सब को मिला दो तो एक आदमी बनता था। आदमी से थोड़ा ज्यादा आदमी। दुनियादार से थोड़ा कम दुनियादार। नाम शमीम था और तखल्लुस फरहत। काम था शायरी और कमजोरी थी शराब। दोनो
 
Arun Aditya
Dec 29 2009 11:51 AM
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अम्मा की चिट्ठी

शहर को खून से लथपथ कर रथ आगे बढ़ चुका है। अब शहर में कर्फ्यू है। इसी कर्फ्यू और दंगाग्रस्त शहर में बेटा फंसा हुआ है। माँ गाँव में है। उसके पास पहुँचती खबरों में दहशत है, आशंका है।दिल्ली में वी पी सिंह की सरकार लाचार है और गाँव में माँ । उसी दौर में लि
 
Arun Aditya
Dec 29 2009 11:51 AM
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क्या अज़ब ये हो रहा है राम जी

प्रदीप कान्त इंदौर की हमारी प्रिय चंट-चौकड़ी ( रजनीरमण शर्मा, प्रदीप मिश्र, देवेन्द्र रिणवा और प्रदीप कान्त ) की एक खास कड़ी हैं। फिजिक्स और मैथ्स में पोस्ट ग्रेजुएट प्रदीप यूं तो राजा रामन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलोजी इंदौर में वैज्ञानिक अधिकारी
 
Arun Aditya
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GAZA का मुसलमां हो या KASHMIR का हिंदू

ये तेरा अँधेरा है, वो मेरा अँधेरा हर दिल में उतर जायेगी जज्बात की तरह हो जाए अगर शायरी भी बात की तरह सूरज है दफ्न फातिहा पढ़ता है अँधेरा आए न कोई रात यूं गुजरात की तरह महंगा है इतना सच कि खरीदार नहीं हैं बाज़ार में कोई कहाँ सुकरात की तरह गाज़ा का मुसलम
 
Arun Aditya
Dec 29 2009 11:51 AM
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चोखेर बाली और चोखेर अश्रु

शिल्प , शिल्पा, शिल्पायें कश्मीर से कन्या कुमारी तक सजा है तोरण द्वार पुष्प अक्षत बरसाए जा रहे हैं लगातार वो आ रही है राष्ट्रीय गौरव की प्रतिमूर्ति सफलता के गरुण पर सवार हवा में चुम्बन उछालती जुल्फें लहराती जताती देश वासियों के प्रति हार्दिक आभार महा
 
Arun Aditya
Dec 29 2009 11:51 AM
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लिख ही डाला अंतिम वाक्य अंतिम बार

लिखो, काटो...फिर लिखो, फिर काटो। इसका क्या कोई अंत है। अंतत: यही सोचकर उपन्यास उत्तर वनवास का अंतिम वाक्य अंतिम बार लिख कर खुद को मुक्त किया। फाइनल स्क्रिप्ट आधार प्रकाशन के संचालक श्री देश निर्मोही जी के पाले में पहुंच गई है। देश जी का कहना है कि जन
 
Arun Aditya
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कारगिल : तीन कवितायें, तीन किस्से

1999 की बरसात के दिन थे। युद्ध के काले बादल बरसकर छंट चुके थे। मगर चुनावी युद्ध के बादल जनता की उम्मीदों पर बरस पडऩे को बेताब थे। चुनाव की रिपोर्टिंग के सिलसिले में उस दिन मैं खरगोन जिले में था। शाम को कहानीकार भालचंद्र जोशी के घर पर जुटान हुआ। संयोग से
 
Arun Aditya
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हबीब साहब ने कहा था- मेरे पास वक्त बहुत कम है

फोटो सौजन्य : द हिंदू बढ़ते बाजार, चढ़ते सेंसेक्स से विकास को मत आंको हबीब साहब ने दुनिया के इस रंगमंच से विदाई ले ली है. उन्हें याद करते हुए पेश है उनका एक पुराना साक्षात्कार, जो अभी 24 मई २००९ को अमर उजाला, सन्डे आनंद में प्रकाशित हुआ है। हबीब तनवीर
 
Arun Aditya
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कृष्णा सोबती से बातचीत

जिंदगीनामा से लेकर समय सरगम तक फैला रचना संसार उनकी कलम के जादू का गवाह है। उनसे बात करना एक विलक्षण अनुभव है । हालाँकि वे आसानी से बातचीत के लिए तैयार नहीं होतीं , लेकिन बात शुरू हो जाए तो फ़िर बेलाग बोलती हैं । हमने भी जब कृष्णा जी को बात चित के लिए
 
Arun Aditya
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फूंकि फूंकि धरनी पग धारौ, महा कठिन है समौ अजोग

कल का दिन सूरदास को समर्पित रहा। सुबह साढ़े दस बजे सूर बाबा की जन्मस्थली सीही (फरीदाबाद) की रज को माथे लगाने का अवसर मिला। देश निर्मोही, डॉ. सुभाष और कई स्थानीय साहित्यकार साथ थे। सबने सीही में सूर स्मारक परिसर में महाकवि की प्रतिमा पर माल्यार्पण किय
 
Arun Aditya
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आइये एक युवा कवि के पहले कविता संग्रह का स्वागत करें

युवा कवि विजय गौड़ का कविता संग्रह सबसे ठीक नदी का रास्ता हाल में ही प्रकाशित हुआ है। उसमें कई ऐसी कविताएं हैं जो दिल को छू जाती हैं। उसी संग्रह से कुछ ऐसी ही कविताएं पेश हैं। पढ़ें और अगर अच्छी लगें तो विजय को बधाई दें। अगर संग्रह खरीदना चाहें तो आप
 
Arun Aditya
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प्रताप सोमवंशी की कवितायें

हमारे मित्र और अमर उजाला, कानपुर के संपादक प्रताप सोमवंशी संवेदनशील कवि हैं। उनकी ये दोनों कवितायें 1993 में जनसत्ता सबरंग के दीवाली विशेषांक में छपी थीं। उसी विशेषांक में मेरी भी एक कविता 'बम्बई इस गाँव के इतने करीब छपी ' थी। इन्ही कविताओं से मैंने
 
Arun Aditya
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मेरे मठ में मेरा हठ है

सबका अपना-अपना मठ है मेरे मठ में मेरा हठ है मैं, मैं, मैं, मैं मंत्र हमारा मैं की खातिर तंत्र हमारा मेरा मैं है मुझको प्यारा मैं अपने ही मैं से हारा मेरे मैं की जय है, जय है मेरा मैं ही मेरा भय है मेरे मैं को आबाद करो मुझको मैं से आजाद करो मैं साधू ,
 
Arun Aditya
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अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!

सुबह आए कुछ फोनों से पता चला की आज मेरा जन्म-दिन है। लोगों की बधाइयां ली, धन्यवाद किया और लगे हाथों अपने मन को भी खुश कर लिया। सुबह-सुबह मन खुश हो गया तो कुछ गुनगुनाने की इच्छा हुई। पर ऐसे खुशनुमा समय में भी 'जय हो' जैसी कोई उल्लसित पंक्तियाँ नहीं या
 
Arun Aditya
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अंधेरे पाख का चाँद और दिल्ली में दोआबे का कवि

वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह को हाल में ही भारत भारती सम्मान देने की घोषणा हुई है। इस बहाने प्रस्तुत हैं केदार जी की तीन कवितायें और उनकी कविताओं पर मेरी एक संक्षिप्त टिपण्णी, जो हरियाणा साहित्य अकादेमी की पत्रिका हरिगंधा के नए अंक में प्रकाशित हुई है।
 
Arun Aditya
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राम चंद्र ने उनका बिगाड़ा क्या था

आधार प्र क ाशन से शीघ्र प्र क ाश्य उपन्यास उत्तर वनवास क ा ए क अंश आप पहल े पढ़ चु क े हैं। पेश है उसकेआगे क ी ए क क ड़ी। पिछले अंश पर क ाफी प्रेर क और विचारोत्तेज क टिप्पणियां मिली थीं। इस अंश पर भी आप क ी प्रति क ्रिया क ा इंतजार है। ) ............
 
Arun Aditya
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जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं

लोटे देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ कुछ ने वजू कराने में ढूंढ़ी अपनी सार्थकता प्यासे होंठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ कुछ को मनुष्यों ने नहाने या नित्यकर्म का पात्र बना लिया बहुत समय तक अपनी अपनी भूमिका में सुपात्र बने रहे सब पर आजकल बदल
 
Arun Aditya
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पहाड़ झांकता है नदी में

मनाली पहाड़ झांकता है नदी में और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी लहरों की लय पर हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी कितना शांत निश्चल है पहाड़ हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता और पहाड़ झांकता है अपने मन में - अरे
 
Arun Aditya
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जुगलबंदी : विष्णु नगर की कविता, रवीन्द्र व्यास की पेंटिंग

नागर जी की ये कविता जब पहली बार पढ़ी तो सचमुच गागर में सागर भरने वाला मुहावरा याद आ गया था। और जब रवीन्द्र की ये पेंटिंग देखी तो फ़िर नागर जी की ये कविता याद आई।रविवार शाम कुछ पुराने मित्रों के साथ नागर जी से आत्मीय मुलाकात हुई। मैंने पूछा कि आपकी कवित
 
Arun Aditya
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ज्ञानरंजन के कबाड़खाने से

भोर पत्रिका का मुख पृष्ठ और अपने ज्ञान दद्दा। (करीब डेढ़ दशक पूर्व मैंने और प्रदीप मिश्र ने मिलकर 'भोर - सृजन संवाद ' नामक पत्रिका शुरू की थी। वरिष्ठ कथाकार और हिन्दी की अत्यन्त महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका ' पहल' के संपादक ज्ञानरंजन जी ने इसका लोकार
 
Arun Aditya
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झोपड़ियों का लैंड स्केप और गरीबी की रायल्टी

उपन्यास का काम लगभग पूरा हो गया है। अब थोड़ी राहत मिली है। एक छोटा -सा अंश यहाँ दे रहा हूँ। इस पर आप लोगों के विचार मेरे लिए मार्गदर्शक होंगे। कभी लघुकथा तक न लिखनेवाले ने सीधे उपन्यास में हाथ डाल दिया है। पता नहीं कुछ बात बन भी रही, या या वैसे ही काग
 
Arun Aditya
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इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग

विचार मर चुका है। विचार मर नहीं सकता है। विचार जिंदाबाद। विचार अमर रहे। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में जब विचार(धारा) का अंत होने और न होने को लेकर इस तरह का विमर्श जोरों पर था, उसी दौरान इस कविता का जन्म हुआ था। उन दिनों विचार के साथ ही कविता के अंत
 
Arun Aditya
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तेजी से सरकती कास्टिंग की पंक्तियों में

बाबा नागार्जुन ने 6 अगस्त 1992 को उनकी डायरी में लिखा था- 'प्रिय हरि मृदुल, तुम्हारी रचनाओं में बेहद ताजगी मिली। आप बहुत आगे जाओगे, सुदूर निकलोगे।' और हरि मृदुल ने बाबा की भविष्यवाणी को गलत नहीं साबित होने दिया है। हाल ही में प्रकाशित हरि के कवित
 
Arun Aditya
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हवा चूमती है फूल को

अन्योन्याश्रित हवा चूमती है फूल को और फिर नहीं रह जाती है वही हवा कि उसके हर झोंके पर फूल ने लगा दी है अपनी मुहर और फूल भी कहां रह गया है वही फूल कि उसकी एक-एक पंखुड़ी पर हवा ने लिख दी है सिहरन फूल के होने से महक उठी है हवा हवा के होने से दूर-दूर तक
 
Arun Aditya