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31 May 2010
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जनसत्ता में लोकरंग- सौंदर्य का विस्तार

जनसत्ता नई दिल्ली, 31 मई 2010.यह आलेख मेरे ब्लाग से ही लेकर जनसत्ता दैनिक अखबार के एडिट पेज पर लगाया गया है। ब्लाग पर इस आलेख का शीर्षक था दीवाल चित्रण की संथाली शैली।
 
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बिहार के लोक नृत्य

बिहार के लोक नृत्यों की फेहरिस्त काफी लंबी है, उनमें से कुछ के बारे में संक्षिप्त परिचय इस पोस्ट के माध्यम से दे रही हूं। प्रत्येक के बारे में विस्तार से पुनः एक-एक कर लिखूंगी।1. नारदी- यह एक कीर्तनिया नाच है। इसमें परंपरागत साज मृदंग एवं झाल का प्रयोग
 
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जंतसार

आज की रेडी टू इट वाली जिन्दगी में भले ही यह अटपटा लगता है, लेकिन कुछ दशक पहले तक गांव की औरतों की जिन्दगी काफी मेहनत मशक्कत करने वाली थी। घर लीपने से लेकर अनाज तैयार करने तक का सारा काम घर की स्त्रियों के जिम्मे हीं होता था। ऐसे में अपनी थकावट दूर करने
 
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है ऐसे मनाया जाता भांजो

पश्चिम बंगाल के ज्यादातर गांवों में बांग्ला भाद्र महीने के आते हीं भांजो नामक फसल की देवी की पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है। यह पर्व फसल के अच्छी पैदावार की कामना से की जाती है। संभवतः भांजो शब्द भाद्र महीने के नाम से निकला है जिस महीने में यह पूजा की
 
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मेरी कुछ नयी पेंटिंग

जादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंचजादोपेटियन पेंटिंग में नया प्रयोग 20X30 इंचजादोपेटियन कला में कुछ नया प्रयोग,24X36 इंच
 
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Feb 16 2010 11:44 PM
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भिटौली की कथा

उत्तराखण्ड के करीब-करीब हर गाँव में भिटौली की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है। पहाड़ों पर चैत के महीने में एक चिड़िया कुई-कुई बोलती है। इसे घुघुती कहते हैं। भिटौली (उपहार) के साथ इसका मोहिल सम्बन्ध है। यह लोक कथा इस प्रकार है, एक गांव में देबुली नाम की लड़की
 
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धर्म और आस्था का प्रतीक गौरी नृत्य

राजस्थान के आदिवासियों की विभिन्न आंचलिक लोक नृत्यों की श्रृंखला में गौरी नृत्य का विशेष स्थान है। इस नृत्य में मनोरंजन के साथ-साथ धार्मिक परंपरा का विशेष रूप से समावेश किया गया है। अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने के लिए किया जानेवाला यह नृत्य राजस्थान
 
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दिवाल चित्रण की संथाली शैली

संथाल आदिवासियों में दिवाल चित्रण की एक समृद्ध परंपरा रही है। इतिहास को तलाशें या फिर मानवीय. सौन्दर्य की अनुभूति की बात करें तो चित्रांकन की प्रवृति आदिम प्रवृति से जुड़ी हुई है। दिवाल चित्रण का पहला उदाहरण गुफा चित्र के रूप में पाते हैं। भारत के इत
 
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चित्रकारी कोहबर की

बिहार के मिथिला तथा सम्पूर्ण मैथिली समाज में शादी के मंडप के साथ-साथ कोहबर का भी बड़ा हीं महत्व है। कोहबर ही वह जगह होती है जहां शादी की रात दुल्हे के द्वार लगने से पहले तक दुल्हन गौरी मां की पूजा करती है। गणपति जी की चित्रकारी से शुरु होकर तरह-तरह क
 
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कौनी दिन देवी जनम तोहार भेल

दशहरा के आते ही झूम उठता है हमारा गांव। देवी मां के मंडप पर तरह-तरह के लोक गीत गाए जाते हैं, वह सारे गीत मुझे इतने अच्छे लगते हैं कि मन ही नहीं होता कि वहां से उठकर कहीं इधर-उधर जाया जाए। वैसे तो झारखंड के गांवों में भी देवी के फिल्मी गातों को बजाने की
 
pritima vats
Sep 18 2009 10:04 AM
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लोक में जीतिया

आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका अथवा जीतिया का व्रत सम्पन्न किया जाता है। इस व्रत को मुख्यतः वही स्त्रियाँ करती हैं, जिनके पुत्र होते हैं। यह व्रत पुत्र के दीर्घायु तथा आरोग्य के लिए किया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार,झारखंड,
 
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मिथिला में दामाद

दामाद तो हर जगह हर समाज में प्यारा होता है, परंतु मिथिला के दामाद की तो बात ही कुछ और होती है। मिथिला में दामाद की खादिरदारी ऐसे की जाती है मानों वह कोई आदमी नहीं भगवान उतर आए हैं धरती पर। दामाद गाँव में प्रवेश किये नहीं कि हर का हर जरुरी से जरुरी काम
 
pritima vats
Aug 03 2009 09:25 AM
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दुबिया कहे हम जमबे करब

झारखंड के लोक में दूर्वा(हरीघास) का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। लोक कथाओं में इसे अमरत्व का वरदान प्राप्त है, तो लोकगीतों के माध्यम से भी इसकी महानता दर्शायी जाती रही है। ऐसी मान्यता है कि जिस जगह ये उपस्थित है वहाँ समृद्धि और सुख हमेशा रहेगा। इसलिए हर
 
pritima vats
Jul 27 2009 05:27 PM
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मनोरंजक राई गीत

गीत-1फागुन महीने रंगीले घर आ जइयो राजा। हाय-हाय रे घर आ जइयो राजा,चार महीना जड़कारे के लागे, थर-थर काँपे बिछौना में, घर आ जइयो राजा। चार महीन गरमी के लागे,चोली भींजे पसीना में, घर आ जइयो राजा। चार महीना बरसा के लागे,पानी जूंवे बिछौना में, घर आ जइयो
 
pritima vats
Jul 23 2009 12:35 PM
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वाद्ययंत्र झारखंड के

नृत्य,गीत और संगीत झारखंड वासियों के प्राण हैं। यह जनजातीय जीवन की सामूहिक यात्रा के अभिन्न अंग हैं उनसे ही लोक जीवन को अभिव्यक्ति मिलती है। पर्व-त्योहार जातीय संस्कृति के अंग हैं। इन त्योहारों में देर रात तक झारखंड के गांवों में सामूहिक नृत्य, गीत औ
 
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अंबुवासी का मेला

कामाख्या मंदिर के अंबुवासी मेले के बारे में संडे नईदुनिया के मैग्जीन में पढ़ा तो अपने बचपन के बीते दिन की याद ताजा हो गई। नीलाचल पर्वत की वो सुन्दरता मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। रंग बिरंगे जंगली फूलों से भरा वह पहाड़ और पहाड़ों के बीच चक्कर खाती
 
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गुड़ी में गोन्चा

आषाढ़ का महीना आते ही बस्तर के लोगों की चहल-पहल देखते ही बनती है। सीरासार के सामने जगन्नाथ गुड़ी (मंदिर) में भगवान जगन्नाथ -बलराम-सुभद्रा की पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है। यह लोक की विशेषता ही है कि हर काम के पीछे कुछ कथाएँ कुछ किंवदन्तियाँ होती
 
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बंगाली लोक गीत

आमि स्वप्ने देखि मधुमालार मुख रे स्वप्न जोदि मिथ्या रे होइतो गलार हार की बोदोल होइतो रे लोकजन। स्वप्न जोदि मिथ्या रे होइतो अंगुरी की बोदोल होइतो रे लोकजन। मदनकुमार जात्रा कोरे, मस्तुल भांग्या पानित पोड़े रे, लोकजन।। आमि स्वप्न देखि मधुमालार मुख रे।।
 
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बांग्ला लोकोक्तियाँ

बांग्ला लोकजीवन में लोकोक्तियों को बड़े ही मनोरंजक अंदाज में प्रयोग किया जाता है। कुछ लोकोक्तियां मैंने यहां पर संकलित करने का प्रयास किया है। शायद आप पाठकों को भी पसंद आएगा- दशजन राजी जेखाने खोदा राजी सेखाने। दस आदमियों का सहमती जहाँ होती है वहाँ भग
 
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आज भी गाये जाते हैं प्रभाती

सुबह के समय गाये जानेवाले गीतों को प्रभाती कहा जाता है। इन लोकगीतों में अधिकांशतः प्रभू स्मरण ही किया जाता है। अंग जनपद में खासकर गंगा नदी के किनारे के इलाके में जो प्रभाती गाये जाते हैं उनमें गंगा ही प्रायः अराध्य होती हैं। कवि विद्यापति के जीवनी को
 
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बासी भात

चैत पूर्णिमा की रात और बैशाख की सुबह झारखंड और बिहार के अधिकांश इलाकों में बासी भात के नाम से प्रसिद्ध है। यह पर्व मुख्यतः गोड्डा,भागलपुर,बांका,दुमका ,देवघर,दरभंगा आदि जिले के गांवों में आज भी बड़े उत्सव के साथ मनाया जाता है। चैत पूर्णिमा की रात को घ
 
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लोक देवता चूटोनाथ

चूटोनाथ के पूजन-दर्शन का कार्य यूँ तो बारहों महीने चलता रहता है। पर वैशाख के महीने में उनकी विशेष पूजा की जाती है जिसे स्थानीय लोग चड़क पूजा कहते हैं। दुमका (संताल परगना) से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर चूटो पहाड़ियों के बीच झारखंड का एक महत्वपूर्ण धा
 
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सोहराय पर्व का आरंभ कैसे हुआ ?

लोक जीवन में हर पर्व, हर उत्सव,हर पहलू के पीछे कुछ न कुछ किंवदन्तियां जरूर होती हैं। सोहराय पर्व को मनाने के पीछे भी एक बहुत ही रोचक कथा है- लोक मान्यता हैं,ठाकरान(आदिदेवी) की हंसली हड्डी (गले की हड्डी) के मैल से बने हांस-हांसिल (हंस-हंसिनी) पक्षियों
 
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क्या आपने चैती सुना है ?

चैती एक खास तरह का गीत है जिसे चैत के महीने में गाया जाता है। इन गीतों में मुख्य रूप से भगवान राम का स्मरण किया जाता है। झारखंड के गोड्डा जिले में रहनेवाले कंचन महतो का कहना है, चैत के महीने में तो सिर्फ राम के लिए ही चित्त चंचल होता है। उनके सुर आज
 
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देवगुड़ी में धरतीपूजा

जिस दिन देवगुड़ी में हल चलाया जाता है उस दिन पूरे गांव में हल चलाने की मनाही होती है, तथा दूसरे दिन से धान की बोआई शुरु हो जाती है। छत्तीसगढ़ के करीब-करीब सभी इलाकों में चैत के महीने में धरती माँ की पूजा बड़े ही धूमधाम से की जाती है।इस पर्व को यहाँ म
 
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फुलवा जैसनी सुकुमार

बिहार और झारखंड (प्राचीन अंगजनपद) के कुछ हिस्सों में आज भी होरी (होली पर गाया जानेवाला गीत) अपने पुराने अंदाज और ठाट से गाया जाता है। शिवरात्रि के दिन से आरंभ होकर होलिका दहन के दिन तक रोज रात में गाया जाता है। दिनभर के कामों से निवृत होकर जब लोग रात
 
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संतालों में शराब की कथा

संताली लोक समाज में शराब के निर्माण को लेकर एक बहुत ही रोचक कथा है। कल्पनाओं पर आधारित होते हुए भी यह बहुत हीं मनोरंजक और शिक्षाप्रद है। पुराने जमाने की बात है। एक बार एक आदमी एक पीपल के पेड़ के नीचे शराब बनाने बैठा। उसके लिए उसने चूल्हा सुलगाया। उस
 
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बिरहा

किसानों के लिये कुछ समय ऐसा होता है जब कोई उत्पादन नहीं होता है, मतलब खेती के लिये उस समय कोई काम नहीं होता। रोजी रोटी की तलाश में तब वो दूर परदेश जाते हैं। परदेश गये इन पतियों के वियोग को महिलाएं अपने गीतों में व्यक्त करती हैं। पति वियोग में गाये इन
 
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अंगिका के फेकड़े

बिहार के अंगजनपद में(वर्तमान भागलपुर तथा उसके आस -पास के इलाकों में) अंगिका भाषा बोली जाती है। यह भाषा जितनी मधुर है उतनी ही समृद्ध भी। मुहावरे और लोकोक्तियाँ तो इस भाषा की जान हैं जैसे। इन लोकोक्तियों को अंगिकाभाषी फेकड़ा कहते हैं। बहुत बड़ी-बड़ी बा
 
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चटख रंगों और लय का अद्भुत मेल है छऊ नृत्य

छऊ नृत्य में कंठ-संगीत गौण होता है और वाद्य-संगीत का प्रधानता होती है। चटख रंग के कपड़े पहनना तथा मुखौटा धारण करना इस नृत्य के लिए आवश्यक होता है। छऊ नृत्य नाटिका पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा के पडोसी राज्यों में आज भी अपने पारंपरिक रूप में देखने को
 
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मलूटी के मंदिर

मलूटी के मंदिर छायाचित्रों में- -प्रीतिमा वत्स
 
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लोक देवी-देवताओं की पूजा

भारतवर्ष के करीब हर राज्य में लोक देवी-देवताओं का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। हर खुशी के अवसर पर जैसे- शादी-ब्याह, जनेउ, मुंडन आदि में सबसे पहले इन देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। बिहार तथा झारखंड में इस अवसर पर जो गीत गाये जाते हैं उन्हें मनान गीत
 
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झारखंड की लोक कथा

झारखंड के आदिवासी समाज में कथा वाचन की परंपरा अब भी बनी हुई है। यहाँ पर पुरानी पीढी के लोग आज भी अपने बच्चो को कथा कहानी सुनाते हुए देखे जाते हैं। एक गांव में एक समृद्ध व्यक्ति के पास धातु के बने हुए कुछ बर्तन थे। गांव के लोग शादी आदि के अवसरों पर यह
 
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आज भी मायके आती हैं टुसु

टुसु का जन्म कब हुआ, कब उसकी शादी हुई, कब ससुराल गई। शायद किसी को भी इसका ठीक-ठीक पता नहीं है लेकिन सदियों से झारखंड,बिहार और बंगाल के कुछ हिस्सों में हर साल एक महीने के लिए टुसु के ससुराल से मायके आने की बात कही जाती है। तथा इसे एक बहुत ही मनोरंजक ल
 
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उपनयन संस्कार गीत

पिछले पोस्ट में मैंने दो उपनयन गीत डाला था, कमेंट के माध्यम से भी और ईमेल के जरिए भी इन गीतो को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का सुझाव मिला था, सो मैं यहां पर इन गीतों का अनुवाद करने की कोशिश कर रही हूँ- 1 पृथ्वी पर खड़ा भेलो वरुवा जनौवा-जनौवा बोले हे..
 
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यज्ञोपवीत अथवा उपनयन संस्कार

बालक जब किशोरावस्था में प्रवेश करने लगता है तो उसे जनेऊ के माध्यम से संस्कारित किया जाता है। इसे यज्ञोपवीत तथा उपनयन संस्कार भी कहा जाता है। यह प्रथा ज्यादातर बिहार तथा झारखंड के ब्राह्मण तथा राजपूत जातियों में प्रचलित है। इस मौके पर महिलाएँ लोकगीत भ
 
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क्यों पाला मुझे इतने जतन से माँ

कुछ आदिवासी (संथाली) संस्कार गीतों के अनुवादः सौहर "ओ मेरी माँ क्यों रो रही हो तुम दरवाजे पर,छाती पकड़कर !" "क्यों न रोऊँ मैं, मेरी बेटी पाला है बड़े यतन से बड़े लाड़-प्यार से मैंने तुम्हें।" "कटोरे के सुसुम गर्म पानी, और अँगीठी की गर्म ताप से की है
 
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लोककथा लछमी जगार की

बहुत पुराने समय की बात है, ऊपरपुर में मेंगराजा और मेंगिन रानी राज्य करते थे। मेंगिन रानी ने हठ किया कि बह मंजपुर देखना चाहती है। तब मेंगराजा के कहने पर अजगलभिमा ने मंजपुर जाकर उनके रहने के लिए वहाँ एक झोपड़ी बनवा दी। वे दोनों मंजपुर में आकर रहने लगे।
 
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लक्ष्मी उर्फ लछमी जगार

धान की फसल कटनी शुरु होने के साथ-साथ हीं अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग लोकपर्व शुरु हो जाता है। बिहार झारखंड में जहाँ यह पर्व नवान्न के रूप में मनाया जाता है बस्तर के ग्रामीण इलाके में भी यह पर्व मनाया जाता है,लेकिन एक बदले अंदाज में जिसे हम लछमी जगार
 
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