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जरा सोचो

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11 Jan 2010
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छूना है आसमाँ...

घर से चला हूँ अकेला,संग संग ख्वाबो का मेला. छूना है आसमाँ... रंग मुझे दो फूलो अपना,चित्र बनाऊँ, बुनू सपना;कोयल देना ऐसा पंचम,गीत जिंदगी, साँसे सरगम. छूना है आसमाँ... पंख लगाके उडे हौसला,बादल पर मै करू घोसला;मंजिल पाने के जोश मेभरलू चंदा आगोश मे. छूना है
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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नये साल का तोहफा : रफिक़ शेख की ओर से

रफि़क़ शेख की आवाज मे सुनो: अहमद फराज़ की  दो गज़ले: तमाम गझलप्रेमींयो के लिए यह है नये साल का तोहफा: रफिक़ शेख की ओर से. आपकी राय उनको  जरूर भेजे. उनका सेल नं. : 9970279968 ई-मेल : gulukar@gmail.comतेरी बाते ही सुनाने आये : जिंदगी से यही
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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रोटी के अजगर ने

रोटी के अजगर ने निगली हयात आधी चबाली उसूलो ने बाकी हयात आधी आज बाप को लटके देखा बेटी ने जब दिल के दिल मे गयी लौटके बरात आधी उसे मनाते पलके बोझल हुई चाँद की करवट बदले रही जागती जो रात आधी जुल्फे,रिश्ते,धरम,किताबे नाम कैद के रिहा हुये तो हरदम पायी निज़ा
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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ग़ज़ल

ना अता,ना पता आदमी लापता गुम हुई कब नदी ऐ किनारे बता हाल क्या गाँव का क्या शहर जानता खो चले स्कूल मे बच्चे अपना पता कर ज़रा सामना दूर क्यों भागता
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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किशोरदा की याद मे :कांच के गिलास

यह कविता मेरे अजी़ज़ किशोर मोरे -जिन्हे हम किशोरदा कहते थे, उनकी डायरी से ली है।किशोरदा मेरे कॉलेज मे Maths पढाते थे।कविता,शायरी, सिनेमा,संगीत से उनका बडा़ लगाव था। राजकपूर,शंकर-जयकिशन, पु.ल.उनके weakpoints थे।किशोरदा अब इस दुनिया मे नही रहे। यह कवित
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
Dec 29 2009 11:57 AM
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ज़रा सोचो

कभी ये दिन भी आयेगा ज़रा सोचो कली को फूल खायेगा ज़रा सोचो सभी को रौंदते निकला बेरहमी से कहाँ पर रथ ये जायेगा ज़रा सोचो मिलेंगे ना तुम्हे माने किताबो मे तजुर्बा साथ लायेगा ज़रा सोचो बचाओ रोशनी थोडी वफा़ओ की घना अंधेर छायेगा ज़रा सोचो नही है याद दिल्ल्
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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ग़ज़ल

है व‍क्‍़त अभी भी संभल जा इस दलदल से बचके निकल जा नही निवाला मिलनेवाला पानी के दो घूँट निगल जा कहता है ये बदला मौसम कल की मैली शकल बदल जा किसी कुँवारे ख़याल की तरह आकर दिल मे खूब मचल जा उम्रभर न उलझ खिलौनो से घडी दो घडी यूंही बहल जा रूई जैसा दबता क्य
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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बस इतना ही

रूक, जरा रूक। इस उच्चासन से रखने दे मुझे पाँव नीचे। फिर छूना उन्हे। रहे मेरे पाँव ज़मीन पर हरदम और तेरा नत होना संपूर्ण। बस इतना ही कहना है मेरा। (मेरी मराठी कविता ‘दर्शन’ का अनुवाद)
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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ग़ज़ल

गली प्रेम की छूटी हम से, कहने को है बात ज़रासी क़िस्मत अपनी रूठी हमसे, कहने को है बात ज़रासी धीमे धीमे रही सुलगती दिल मे बस्ती अरमानो की चिंगारी सी फूटी हम से, कहने को है बात ज़रासी कहो आप ही कैसे निकले आख़िर सच्चे बयान अपने क़समे ले ली झूठी हमसे, कहने को
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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ग़ज़ल

हर मुश्किल का हल हो जैसे आज नही तो कल हो जैसे आबाद हो गयी दिल की दिल्ली घर छोटासा, महल हो जैसे महकी महकी बाते उसकी पके आम के फल हो जैसे सूना सूना लगे भीड मे शहर नही जंगल हो जैसे यही ठहरती सुई घडी की तेरी याद का पल हो जैसे मेरे ऐब भी प्यारे तुझको तू म
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
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मुबारक हो।

सूखी घास के ढेर को शरारा मुबारक हो, अंधो को रोशनी का नजा़रा मुबारक हो। किसने उँडेल दी है कालिख आसमाँ पर, गर्दिश मे डुबता वो सितारा मुबारक हो। पाँव निकल पडे तो रास्ते अपाहिज हो गये, लो बैसाखियो का सहारा मुबारक हो। फूलो के सर क़लम कर दिये पत्तो की धार
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत
Dec 29 2009 11:57 AM
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फूलों को साँस लेने दो

स्लम डॉग मिलेनिअर’ फिल्म के ‘जय हो’ गीत के लिए ‘ऑस्कर २००९’ जितने वाले गुलजा़र साहब को सादर समर्पित. ‘फूलोंको साँस लेने दो’-यह रदीफ़ उन्ही की देन है।) हटाओ काग़ज़ी घूँघट फूलों को साँस लेने दो बदलती है खुशी करवट फूलों को साँस लेने दो रहे वे मुस्कुराते
 
डॉ.श्रीकृष्ण राऊत