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हरी मिर्च

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06 Jun 2010
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बढ़ते हुए बच्चे

रे ओ   इधर,   छोटी लहर,  जलधार   बहने  को  चलीआ निश्छ्ला, कल कल किलक, उद्गार कहने को चलीआ चल चली ठुमकी ठुमक नव पग नवल पदचाप ले नव कल्पनाएँ सृजन वन,  सह त्रृण तने खुद आप ले रचने  
 
जोशिम
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एकी यात्रा

आवाज़ तन्द्रा और कमजोरी किसी कहानी कविता से नहीं पैदा हुईं थीं उनकी,उनका न संग पता था न थिर-रूप, पता-ठिकाना था भी और नहीं भी था सरे आम में, उल्काएं थीं या थिरकी मुद्राएं शायद परस्पर अनुरोध में या संग्राम में.जिसके पैर भी न देखे थे, आँखें पीछे ही पीछे लगी
 
जोशिम
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आजकल फ़िलहाल..

क्या बताएं कब औ क्या करना है जी हुज़ूरकैसे जीना, या किस तरह मरना है जी हुज़ूरवैसे हैं जितने वक्त, ये मौका-ए-कायनात मेंहर शाम घर में चूल्हा भी जलना है जी हुजूरफिर मान भी लें रस्म-ए-नंगई का है रिवाज़ आदत हमें नहीं, ये बदन ढंकना है जी हुजूरअब बेघर कहाँ रहेंगे
 
जोशिम
May 23 2010 12:18 AM
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अल्ज़्हाईमर

... ये मां के लिए, जो जाने कितने सालों से, बेनागा रोज सप्तशती कवच के पाठ को ही पूजा मानती थी.....इदं फलं मयादेवी स्थापितं पुरतस्तव, तेन मे सफलावाप्तिर्भवेत् जन्मनिजन्मनि.....– गए दो तीन सालों में इस बीमारी ने धीरे धीरे घुस पैठे स्मृति हुनर विवेक
 
जोशिम
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बड़बड़झाला

कह कहे साहब हमारे लाट, कुछ ना झाम करना बंधु, आईन्दा से, केवल काम के ही काम करनाक्या धरा है? तेज धारा है, समय की है गति दृतमानशामें शोख, हैं दिन धूम, धरती है नगर परिधान क्या है देखनी, जो रात-बीती, बात-बीती, बुझ गई बत्ती जला ले, रोशनी कर, देख बाकी घूमते
 
जोशिम
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बेतार की जिरह

कुछ सोच हैं, हैरान हूँ, परेशां हूँ बा वजह, खुद के नाम हम कहूं, या यूं कहूं कि मैं.क्या यूं कहूँ, ज़र्रा हूँ फू, सहरा में गुम गया,एक जड़ हूँ बगीचे में, या गुंचों में है जगह. किन खुशबुओं   में ख़ाक हूँ, किस रंग में फ़ना,मैं हूँ यहाँ, या चुक गया, दफ़ना
 
जोशिम
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भोथरा

लोहा आवाज़ की बुलंदी   पर बिखरने में लगा है, लोहा   कागज   के कगारों से  छितरने में लगा है. और है तेज़ मुहिम, ईमारतों में लगाने  की  लोहा, ये मुआ गोलियों, छुरों, छर्रों में
 
जोशिम
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वो जो बस नहीं है देह में ....

..यहीं कहीं है, रहेगा यहीं कहीं स्मृतियों के अवलेह में..कार्तिक (२ जून २००४- २४ मार्च २००९) के लिएओ रे तारे,  जहां दूर जाना ज़रा,   सारे तारे-जहां घूम आना ज़रादूर से ही वहीं, टिमटिमाना ज़रा, ओ किरन की कनी, यूं दिखाना ज़रावो
 
जोशिम
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रोटी बनाम डबल रोटी ?

थोड़ी मोहब्बत सभी पर उतरने दें थोड़े करम चाहतों पर भी करने दें सितारों की महफ़िल रहे आसमानी ख़ुदा बंद जड़ को, ज़मीं से गुज़रने दें बूंदों के रिसने को रोकें नहीं बस सागर रहें, अंजुरी भर दो भरने दे जब छूट पाएं वो फ़ाज़िल सवालों से बैठक से बाहर, नज़र चार धरने
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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शब्द बौने

शब्द बौने पायलों में रुन्झुने ईख के गंडे चुने हैं बड़े नटखट, सलोने शब्द बौने शब्द बौने ले उडे तारे, चमाचम चाँद, मारे आँख हरदम, साज ताजों के बिछौने शब्द बौने शब्द बौने कौंधते बिल्लौर घन जोडें जुगत जादू जतन पकड़ते कुर्तों के कोने शब्द बौने शब्द बौने खे
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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घुमक्कड़नामा -शून्य

टहलते,टहलते, गमक गुनगुनाते, रास्ते चमकते, चमक रूठ जाते लरजते बरजते, खयालों में आते, रातों में छपते, छपक टूट जाते बहानों से किस्से, गुमानों के मंज़र तरीके बदलते रहे ख़ास अवसर सलीके सुलझते अगर चैन पाते वहीं आ गए इस सहर, घूमफिरकर रिझाते ज़हन को कहीं थाम
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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एक कविता लिखने की कविता

चल-चल, निशा की सोच में, मानव जगाले, चल आ चल, कलम की नोक से, कागज़ जलाले, चल दीखे दाख हैं दिन भर खड़े गल्पों के रेती घर तमन्ना की रसीदें तम नयन भर मील के पत्थर पलक भर भूल दुःख जीवन अरे लिख रागिनी अनमन कोई बस पढ़ जुड़ा लेगा तेरे इस मन से अपनापन द्वार दर ख
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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राम राज्य (१९४६ में लिखी एक कविता )

६ जनवरी २००२, ६ वर्ष पहले, बब्बा (पिता, श्री जगदीश जोशी ) ने अपना यहाँ का सफर समाप्त किया था । एक भरपूर तेज, उत्साह, उमंग, संवेदना, संघर्ष, आवाज़, यायावरी और वैसे ही सारे संवादों को जीने के बाद । संताप से नही वरन उनकी पूरी लगन से जी हुई ज़िंदगी और जि
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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दोपहर का गान

चलने लगा, चलता गया, बनता गया, मैं भी शहर बेमन हवा, लाचार गुल, ठहरी सिसक, सब बेअसर रोड़ी सितम, फौलाद दम, इच्छा छड़ी, कंक्रीट मन उठने लगी, अट्टालिका, बढ़ती गयी, काली डगर कमबख्त कम, पैदा हुआ, सीखा हुआ, वैसा नहीं जिस रंग में, बदरंग था, उस ढंग में, सांचा कहर
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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अरब, शंख, पद्म शुभकामनाएँ

एक जाता हुआ साल - ३ बहुरि थके देसी शेर - अरब, शंख , पद्म शुभकामनाएँ - एक गपोड़्शंख वहां सो चुकी है रात, या मौसम सिंदूरी है तुम्हारे और मेरे बीच, बस बातों की दूरी है आधे से अधूरे छू गए, थोडी सी बक-बक में जो रह गए वो मनचले फेहरिस्त पूरी है इस साल की मीय
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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एक दिन/ रात आज़ाद

रात के सफ़र कटें, आख़िर सफ़र बयान बने तुम बनो, हम बनें, काश हिन्दोस्तान बने सिर्फ़ इतना ही गुलामों ने आज़ादों से कहा शायद इस साल, कुछ और नए इंसान बनें किले कीलों से जड़े हैं, महफिलें मस्तूलों में, यही कहना है, थोड़ी बेहतर सी पहचान बने वो ही चेहरे हैं ज़
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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नज़रबट्टू

एक पिंजरा, एक बदरी, एक प्याली चाय, ढूंढ कर मन ढूंढ लें चल झुंड में समुदाय। खोज में जो भी मिले, या ना मिले, मिल जाय मन, सब एक सा हो, या नहीं हो, हो तनिक दीवानापन, मद हो, न हो मद-अंध, बन्दे एक ना हों, साथ हों , मादक बहस, विस्तार नभ, चुटकी हो बातों से च
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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कथाहारा

मर्म के सब पाँव बोझिल हो चुके हैं टीस के तलवे तले फटती बिवाई, रिस गई है रोज़मर्रा रोशनाई, प्रीत के पद / राज़ अंतर्ध्यान हो कर खो चुके हैं। योजना की भीड़ में सहमे सफ़े सबहाल, बेसरपैर बातों के घुले दिन साल, आदम-काल, बिखरी पीड़ के निर्वाण के पल धो चुके है
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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जीवनसाथी

तुमको बस देखूं, तुम्हारी आँख में तारे पढूं मुश्किलों के दिन, दियों की जोत के बारे पढूं बन में परेशां परकटे, बादल उतर आएं जहाँ बिजलियों के बीच बहकर, धीर के धारे पढूं धूल उड़ बिछ जाएगी, थोड़ा सफ़र है गर्द का ग़म समय में याद करके, याद के प्यारे पढूं राहत
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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अटपटे कपाट

पिछले एक महीने के अवकाश के समय जोड़ जोड़ कर लिखी हुई - जब ख़ुद पढ़ा तो लगा कि ईंट / मट्टी वाले चूल्हे में मिटिया की हांडी में खिचड़ी सी पक रही है और आवाज़ आ रही ख़ुद-बुद -ख़ुद-बुद-बुद-बुद -ख़ुद-बुद.... ....अभी फिर अनिश्चित कालीन अवकाश - थोड़ा काम आ गया
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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चुप : गरमी के मौसम में

खिड़की खुली रक्खें, हवा से चोर झोंके आएंगे, पीठ पल्लों पर धरेंगे, मौन को बहलाएंगे । जालियों से जूझ कर के, राहतों को मूँद कर के, उलझनों के वाक्य आधे, बाबतों की बूँद भर के, ओंठ पर अठखेलियाँ कर, शब्द पढ़ कर गाएंगे, गीत छंदों से खुलेंगे, मुक्त हो उड़ जाएं
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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साधारण का साधारण गीत

फुटकर-चिल्लर के बाजीगर, गाजा-बाजा गाते आना। योजन भर के अरमानों में, संक्षिप्त रूप से बह जाना। ज्यों द्वेष नहीं कर पाते हो, उपदेश सहज कर लाते हो। चित तेज धार पर जाते हो, पट मंथर- मंथर आते हो । ऐसे करतब दिखलाने में, नट, खट से झट कर जाने में, सब सही नही
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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उदारीकरण : उपसंहार

बाज़ार के बीचों बीच भरापूरा धंसता हुआ, बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ, पीछे मुड़ कर देखता है / आगे चलता है, पोले खम्भे से भट भिड़ता है, पीछे देखता ही क्यों है? लम्बी दौड़ का कछुआ। बाज़ार में -और अन्दर घुसता हुआ पीछे देखता है शायद, बाज़ार के मुहाने से पीछ
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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आशा का गीत : आशा के लिए

बस ना धुलें अच्छे समय के वास के दिन वह संग चलते मरमरी अहसास के दिन जो अंत से होते नहीं भी ख़त्म होकर सच ठीक वैसे मृदुल के परिहास के दिन हल्के कदम की धूप के, टुकड़े रहें जी सरगर्म शामों के धुएँ, जकड़े रहें जी राजा रहें साथी मेरे, जो हैं जिधर भी बाजों को
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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हलफ़नामे पर विवाद होना ही है

इस बात पर भौहें तनी, पलकें उठीं, और पुतलियों के नृत्य हैं। कह्कशाँओं में अधिकतर, लोभ के ही भृत्य हैं। अतिशय अभी अति-क्षय नहीं, अनुराग है रंग-राग से, हाँ चाहतों से भय हटा, है प्रीति प्रस्तुत भाग से। स्वागत शरण दे सर्वदा, संतुष्टि रहती अलहदा, परमार्थ क
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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सवेरे का सपना : स्वप्न का प्रलाप : तनाव के दिन

बहुत -बहुत दिनों से सपना सवेरे की नींद तोड़ता है,- सार में बराबर सा, - रूप हो सकता है थोड़ा बहुत ऊपर नीचे हो - हो सकता है बाहर निकले तो कुछ कम हो, पर होगा नहीं - उसमें समय अभी है - फ़िलहाल है कविता जैसा कुछ -अगले और पिछले अंतरालों का तर्जुमा - यह नहीं
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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होलिफ़ लैला

देखिये, होली में जो देस में हैं सब हल्के हो रहे हैं, आप सब को शुभ कामनाएं, हम तो अरब देश में पड़े हैं, और होली में काम पर जा रहे हैं, आप कुछ गुझिया हमारे लोगों के नाम की भी खा लीजियेगा और ... [ बाकी आप सब विद्वान् हैं ] तो जो होली में हमारे जैसे काम प
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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नहीं लिखने के बहाने - ५

सिर्फ़ कोशिश है बस, हर कोशिश में लटक जाती है एक टक देखने जाता हूँ, मेरी आँख झपक जाती है और निगाहें भी ग़लत से, किसी दम मिल जो गईं आईने बन के तो आते है, मुई शक्ल चटख जाती है फिर अगर चेहरे ही दिखे, उन सब मुखौटों से अलग पहले पानी में बहे जाते हैं, और ला
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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हाशिये पर अल्प विराम

लगता नही कभी बनाएगी, कविता मुझे तो, बेफ़िकर, बेखौफ़, सीधा, सच्चा और होशियार । कुछ नहीं करती सिर्फ़ कविता, न लाड़, न प्यार, न ईर्ष्या, भेद न दुत्कार जैसे कुछ नहीं कर पाते, अकेले के अरण्य में दहाड़ते मतिभ्रम, डर के प्रतिहार, डाकिये के बस्ते में, खुंसे बै
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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समझौता [ पसिंजर ?]

देखें - कौन पुल सा थरथराता है ?] क्रांतिपथ के थे पथिक, जो श्रृंखलाओं में जड़े हैं अब कहाँ जाएँ सनम, मजबूरियों के स्वर चढ़े हैं युगों जैसे साल बीते, भंवर से जंजाल जीते, अव्वलों की प्रीत बोते, परीक्षा के पात्र रीते, भर गए जब सब्र प्याले, बुत मशीनों में ग
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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किताब हिसाब

याने अफसाना नंबर दो ; उर्फ़ जहाज का पंछी; उर्फ़ घुमक्कड़नामा - एक] क्या किया? क्या ना किया?, किस भीड़ से कथनी निकाली क्यों थमे? कब चल पड़े? बहते बसर, सैलाब से अटकल मिलाली कुछ इस तरह बस्तों ने शब्दों से वफ़ा ली इतने इलाके घूम-चक्कर बैठ घर दम फूलता प्रति
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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कोट-पीस दफ्तरी

उर्फ़ नौकरी की छनी खीज - - दोस्तों के शब्दों में - नग़्मा- ए- ग़म-ए-रोज़गार ] कमख़्वाब नींद, कमनज़र ख़्वाब, डर मुंह्जबानी ऊबे निश्वास, भटके विश्वास, उफ़ किस्से-कहानी सुबह होड़-दौड़, शाम आग-भाग, कौतुकी खट राग, मृगया मशक्कत, दीवानी कसरत, धौंस पहलवानी कूद-क
 
जोशिम
Dec 29 2009 11:48 AM
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प्रभाहत

क्या अभी भी बैठे हैं वहाँ सपने देखने वाले चिड़िया की कलगी पर चीड़ों की फुनगी पर देखते हैं आभा के रक्तिम जहाँ दीखते हैं गहरे से काले [सपने देखने वाले] लौटने वाले साए लंबे होते हैं छाया से प्रेत गर्म हवाएं देस के भेस लौटती आशाएं बरसात की बाती उम्मीदें जि
 
जोशिम