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11 Jan 2010
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ग़ज़ल - इक् ज़रा सी बात पर

इक् ज़रा सी बात पर आ गए औकात परआप भी हंसने लगेअब मेरे जज़्बात परखूब रोया फिर हंसावो मेरे हालात पारफिर ज़मीं प्यासी हुई फिर नज़र बरसात पारजिंदगानी वार दोप्यार के लम्हात पार _________________कवि दीपक गुप्ता9811153282, 93211153282www.kavideepakgupta.comDehli ,
 
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ग़ज़ल - मैंने उसको बताया बहुत कुछ

मैंने उसको बताया बहुत कुछउसने मुझसे छुपाया बहुत कुछज़िन्दगी में गंवाया बहुत कुछपर गँवाकर भी पाया बहुत कुछकुल मिलकर अगर मैं कहूं तोज़िन्दगी ने सिखाया बहुत कुछवक़्त के साथ चलने लगा मैंमुझमें बदलाव आया बहुत कुछकुछ कमी थी मेरी ही नज़र मेंआईने ने दिखाया बहुत
 
kavideepakgupta
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ग़ज़ल - अगर मैं झूठ बोलूँ तो मेरा किरदार मरता है

अगर मैं झूठ बोलूँ तो मेरा किरदार मरता हैजो बोलूँ सच तो फिर भूखा मेरा परिवार मरता हैशिकायत सबको है मुझसे कि मैं कम कहता हूँ, लेकिनरहूँ मसरूफ कहने में तो कारोबार मरता हैमुझे लगता है मेरी ज़िन्दगी का अंत यूं होगाबिना उपचार के जैसे कोई बीमार मरता हैअना जिंदा
 
kavideepakgupta
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ग़ज़ल - मेरी फ़ितरत अगर तुम जान लेते

मेरी फ़ितरत अगर तुम जान लेतेकहा मेरा ख़ुशी से मान लेतेइशारे ग़र समझते आईने केयकीनन ख़ुद को तुम पहचान लेतेक़दम मंज़िल पे जाकर ही ठहरतेज़रा सी ज़िद अगर हम ठान लेतेकिनारा कर लिया हमने ही उनसेकिसी के कब तलक अहसान लेतेचुराया दिल औ छीना चैन मेराअमा क्या और मेरी
 
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ग़ज़ल - एक दिन वो जवाब मांगेगा

एक दिन वो जवाब मांगेगा ज़िन्दगी का हिसाब मांगेगा वो मुहब्बत में सबसे पहले तो तेरी आँखों के ख्वाब मांगेगा मैंने ग़ज़लें कही पता था कि, वो मुझसे मेरी किताब मांगेगा तेरे होठों की ताजगी ऐ सनम बाग़ का हर गुलाब मांगेगा दिन में तौबा करेगा वो "दीपक" शाम होते
 
kavideepakgupta
Dec 29 2009 11:41 AM
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ग़ज़ल - बनाकर अपनी दुनिया को उसे बर्दाश्त भी करना

बनाकर अपनी दुनिया को उसे बर्दाश्त भी करना खुदा मेरे, मैं तेरे हौसले की दाद देता हूँ परिंदे ने कहा तू कैद रख या कर रिहा मुझको मैं अपनी ज़िन्दगी का हक़ तुझे, सैय्याद देता हूँ मैं दुःख से घिर गया तो गैब से आवाज ये आयी सुखों की छावं मैं अक्सर दुखों के बा
 
kavideepakgupta
Dec 29 2009 11:41 AM
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ग़ज़ल - ज़माने में बिना मतलब के मतलब कौन रखता है

ज़माने में बिना मतलब के मतलब कौन रखता है किसी के ज़ख्म पे मरहम भला अब कौन रखता है वो इक विश्वास ही तो है उसे मानो न मानो फ़लक पर ये उजाला और ये शब् कौन रखता है ये मेरी ज़िन्दगी के रास्तों पे उलझनें हर पल मैं तुझसे पूछता हूँ तू बता रब, कौन रखता है मेरा
 
kavideepakgupta
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ग़ज़ल - मेरे भीतर हुनर मेरा कुछ ऐसे छ्ट्पटाता है

मेरे भीतर हुनर मेरा कुछ ऐसे छ्ट्पटाता है कफस में कैद पंछी ज्यों परों को फडफडाता है किसी को आइना दिखलांऊ तो दिखलांऊ मैं कैसे मेरा किरदार ही जब मुझपे खुद उंगली उठाता है न जाने क्या गुनह मुझसे हुए तारीक रातों में उजालों में मेरा साया तलक मुझको डरता है ग
 
kavideepakgupta
Dec 29 2009 11:41 AM
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नए शेर

मेरी ज़िन्दगी ने ये साजिश रची है न सपना है कोई न ख्वाहिश बची है पता है फकत चार दिन का है जीवन सभी को मगर हाय- तौबा मची है ये शोहरत अजब शै है "दीपक" समझ लो मुकद्दर है उसका ये जिसको पची है कवि दीपक गुप्ता 9811153282 , 9311153282 www. kavideepakgupta.co
 
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बिटिया - कुछ दोहे

बदलो अपनी सोच को, कुछ तो करो विचार बिटिया से परिवार है, बिटिया से संसार घर- घर में इस बात को, मिले उचित सम्मान बिटिया घर की आन है, बिटिया घर की शान सुता न मारो कोख में, घोर लगेगा पाप करना होगा प्रायश्चित, जब होगा संताप है जननी का रूप यह, जग का है आधा
 
kavideepakgupta
Dec 29 2009 11:41 AM
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ग़ज़ल - जितने तेरी यादों के बादल छाए

जितने तेरी यादों के बादल छाए उतने मेरी आंखों में आँसू आए मन सागर की बंद सीपियाँ खोलीं जब आंखों से झर-झर झरते मोती पाए नींद खुली तो पंछी बनकर फुर्र हुए आंखों ने कुछ ऐसे सपने दिखलाए सिर्फ़ अना ही मेरी , मेरे साथ रही लालच के सब सौदे मैंने ठुकराए जिनको स
 
kavideepakgupta
Dec 29 2009 11:41 AM
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ग़ज़ल - ये ख़ुदा ने है बक्शी तुम्हे

ये ख़ुदा ने है बक्शी तुम्हे ज़िन्दगी की इबादत करो फ़र्ज़ इंसानियत का है ये तुम सभी से मुहब्बत करो भीड़ में खो न जाना कहीं ख़ुद ही अपनी हिफाज़त करो दोस्ती ये सिखाती नहीं दोस्तों से सियासत करो जो लिखा है मिलेगा वही क्यूँ किसी से शिकायत करो मुझमें बचपन है
 
kavideepakgupta
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ग़ज़ल - अपने हाथों मुकद्दर बना कब सके

अपने हाथों मुकद्दर बना कब सके और ख़ुद को सिकंदर बना कब सके हम, फ़क़ीरों की दुनिया में आ तो गए ख़ुद को लेकिन कलंदर बना कब सके हम सभी ने मकां तो बनाये मगर हम मकां को कभी घर बना कब सके पत्थरों के नगर में रहे घूमते मील का ख़ुद को पत्थर बना कब सके मन तो क
 
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ग़ज़ल - वक़्त के साथ चलने लगा हूँ

वक़्त के साथ चलने लगा हूँ धीरे- धीरे संभलने लगा हूँ बात कोई तो है मुझमें जो मैं उनकी नज़रों में खलने लगा हूँ आईने को शिकायत है मुझसे रोज़ चेहरा बदलने लगा हूँ ज़िन्दगी को समझने की खातिर दोस्तो, ख़ुद को छलने लगा हूँ नर्म लहज़ा हुआ जब से मेरा तब से शोलों
 
kavideepakgupta
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ग़ज़ल - फ़क़त ये है दुआ रब से

फ़क़त ये है दुआ रब से मेरा रिश्ता रहे सब से हुईं कुछ ग़लतियाँ जब से सुधरने मैं लगा तब से दुआ दिल से निकलती है कही जाती नहीं लब से उजाले तक पहुँचने को गुज़रना पड़ता है शब् से मेरे अहबाब पूछे हैं तू शायर हो गया कब से .... कवि दीपक गुप्ता 9811153282, 931
 
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ग़ज़ल - यूं ही वक्त न जाया कर

यूं ही वक्त न जाया करख़ुद से भी बतियाया करउसपे इश्क का भूत चढाउसको मत समझाया करइज्ज़त , दौलत या रिश्तेकुछ तो यार कमाया करडर से ही मर जाएगाइतना मत घबराया करइक दिन मिटटी होना हैज्यादा मत इतराया करमन की अंधी गलियों मेंदीपक रोज़ जलाया करकवि दीपक
 
kavideepakgupta
Sep 17 2009 10:17 PM
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फरीदाबाद गौरव सम्मान - 2009 - कवि दीपक गुप्ता

मानव सेवा समिति , फरीदाबाद द्वारा काव्य क्षेत्र के लिए कवि श्री दीपक गुप्ता को फरीदाबाद गौरव सम्मान से सम्मानित / अलंकृत करते हुए15 - 08 -09कवि दीपक गुप्ताhttp://www.kavideepakgupta.com/90 (FF) Ashoka Enclave Part - 1,Sector - 34, Faridabad -
 
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Aug 21 2009 06:54 PM
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ग़ज़ल - कौन था अपना पराया कौन था

कौन था अपना पराया कौन थाजो मुझे, मुझ तक ले आया कौन थाजो इशारों में हिदायत दे गयासोचता हूं मैं वो साया कौन थावो खुदा था, वक्त था या आइनारास्ता जिसने दिखाया कौन थावो तसव्वुर था तुम्हारा या थे तुमनींद में जो मेरी आया कौन थामैं दिमागी तौर से था होश मेंफिर ये
 
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ग़ज़ल - मैं तो जिंदा हूँ मुहब्बत के लिए

मैं तो जिंदा हूँ मुहब्बत के लिएइक् फकत उसकी इबादत के लिएपहले रिश्तों की ज़रूरत थी हमेंआज रिश्ते हैं ज़रूरत के लिएसर उठाता हूँ ये है मेरी अनासर झुकाता हूँ इबादत के लिएमेरी बदनामी का आलम तो ये हैजाना जाता हूँ शराफत के लिएये बलायें क्या बिगाडेंगी मेराहै खुदा
 
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कवि अशोक चक्रधर जी के हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष बनने पर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी का धन्यवाद

माननीय श्रीमती शीला दीक्षित जीमुख्यमंत्री , दिल्ली सरकार,दिल्लीविषय : श्री अशोक चक्रधर के हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष बनने के सन्दर्भ मेंमाननीय शीला जी ,जानकर प्रसन्न्ता हुई कि दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष हेतु प्रोफेसर अशोक चक्रधर जी को
 
kavideepakgupta
Jul 24 2009 11:42 AM
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ग़ज़ल - आदमी के पर नहीं होते

आदमी के पर नहीं होते हौसला परवाज़ देता है आँख में सपने अगर हों तो रास्ता आवाज़ देता है बात कितनी भी पुरानी हो वो नए अंदाज़ देता है सोचता हूँ मेरे दुश्मन को कौन मेरे राज़ देता है लौटकर आया है कोई क्या क्यों उससे आवाज़ देता है जब ग़ज़ल को शक्ल देता हूँ त
 
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नेकी कर और गाली सुन

आज भी दिन की शुरुआत मानसिक तनाव से हुई , हुआ यूँ कि किसी मित्र को २ महीने पहले कुछ हजारों रुपयों की अनायास जरूरत आन पड़ी तो उसने मुझसे एक निश्चित तारीख को पैसे वापिस देने का वादा करके उधार पैसे ले लिए ....मैंने भी उसकी मद्दद कर दी .....पर जब निश्चित त
 
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तंज के शेर

इक् ज़रा सी बात पर आ गए औकात पर आप भी हंसने लगे अब मेरे जज़्बात पर अब भरोसा क्या करें आदमी की जात पर कवि दीपक गुप्ता 9811153282 - 9311153282 www.kavideepakgupta.com
 
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गीत - मौसम के मस्तक पर मैंने

मौसम के मस्तक पर मैंने नाम तुम्हारे लिख दी पाती और प्रतीक्षारत उत्तर में बादल का मन झांक रहा हूँ अक्सर मुझसे बतियाता है मस्त हवाओं का हरकारा आते- जाते बतला जाता क्या है प्रियतम हाल तुम्हारा झंझाओं को झेल रही है नित दीपक की जलती बाती कितना जीवन शेष अभ
 
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फिर नए शेर ......

बनाकर अपनी दुनिया को उसे बर्दाश्त भी करना खुदा मेरे मैं तेरे हौसले की दाद देता हूँ परिंदे ने कहा तू कैद रख या कर रिहा मुझको मैं अपनी ज़िन्दगी का हक़ तुझे, सैय्याद देता हूँ मैं दुःख से घिर गया तो गैब से आवाज ये आयी सुखों की छावं मैं अक्सर दुखों के बाद
 
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नए शेर ......

ज़माने में बिना मतलब के मतलब कौन रखता है किसी के ज़ख्म पे मरहम भला अब कौन रखता है वो इक विश्वास ही तो है उसे मानो न मानो तुम फ़लक पे ये उजाला और ये शब् कौन रखता है ये मेरी ज़िन्दगी के रास्तों पे उलझनें हर पल मैं तुझसे पूछता हूँ तू बता रब, कौन रखता है
 
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हास्य कवि श्री अल्हड बीकानेरी जी का निधन

मित्रों आप सबको सूचित करते हुए बहुत दुःख हो रहा है कि काव्य मंचों के वरिष्ठ हास्य कवि श्री अल्हड बीकानेरी जी का आज सुबह ( 17-06-09) निधन हो गया है ....वो कुछ महीनों से अस्वस्थ थे ..........आइये हम उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करें........ कव
 
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कवि समाज को आघात

जैसे कि आप सबको ज्ञात है कि 08 जून को सुबह भोपाल में एक कार एक्सीडेंट में देश के तीन बड़े कवियों का निधन हो गया है ...जिनमें हास्य व्यंग्य के कवि श्री ओम प्रकाश आदित्य जी तथा श्री नीरज पुरी और ओज रस के कवि श्री लाड सिंह गुर्जर है इनके अलावा कवि श्री
 
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नए शेर

एक दिन वो जवाब मांगेगा ज़िन्दगी का हिसाब मांगेगा वो मुहब्बत में सबसे पहले तो तेरी आँखों के ख्वाब मांगेगा मैंने ग़ज़लें कही पता था कि, वो मुझसे मेरी किताब मांगेगा दिन में तौबा करेगा वो 'दीपक' शाम होते शराब मांगेगा कवि दीपक गुप्ता http://www.kavideepak
 
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ग़ज़ल - लापता लोग भी मंजिल का पता देते हैं

लापता लोग भी मंजिल का पता देते हैं डूबने वाले ही साहिल का पता देते हैं ऐसे - ऐसे भी यहाँ कितने ही कातिल है कि , जो कत्ल करते हैं औ बिस्मिल का पता देते है कोई जब पूछता है हमसे कहाँ रहते हो पूछने वाले को हम दिल का पता देते हैं आपके हंसने - हंसाने के अज
 
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चुनावी मौलिक छंद

ऊँच - नीच, भेद-भाव भूल गले मिल रहे जनता से दूरी वाली खाई पाटने लगे बदल - बदल दल ऐसी हुई हालत कि अपने विरोधियों का थूक चाटने लगे आते ही चुनाव ऐसा हो गया प्रभाव अब ओट ले के वोट की वो नोट बाँटने लगे सुनते हैं जूते बस पाँव काटते हैं पर आजकल नेता का टिकट
 
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ग़ज़ल - ठौर ना ठिकाना है

ठौर ना ठिकाना है हाल शायराना है प्यार ही कमाना है प्यार ही लुटाना है दर्द का हमारे घर खूब आना जाना है रौशनी जो दे सबको दीप वो जलाना है अक्ल वाले अंधों को आइना दिखाना है कवि दीपक गुप्ता 9811153282 - 9311153282 www.kavideepakgupta.com Delhi NCR , India
 
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ग़ज़ल - 4 शेर - उपरवाला फल देगा

ऊपरवाला फल देगा आज नहीं तो कल देगा जिसने प्यासे होंठ दिए वो ही इनको जल देगा रातों का अंधियारा ही एक सुनहरा कल देगा जीवन की हर मुश्किल का जीवन ही कुछ हल देगा कवि दीपक गुप्ता 9811153282 - 9311153282 www.kavideepakgupta.com Delhi NCR , India
 
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कुछ शेर

किसी को आइना दिखलांऊ तो दिखलांऊ मैं कैसे मेरा किरदार ही जब मुझपे खुद उंगली उठाता है ग़लत रस्ते की जानिब पाँव मेरे जब भी उठते है तो वालिद की तरह ये वक्त भी आँखें दिखाता है अदायें देखिये उसकी वो छुप - छुप कर मुझे अक्सर हवाओं के हवाले से इशारा कर बुलाता
 
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पिताश्री को समर्पित

घरवालों से जब बतियाया तब मैं जाना घर कर मतलब अपने दम पर उड़ा परिंदा तब वो जाना 'पर' का मतलब छिड़ बैठी जब बात अना की तब मैं जाना सर का मतलब सर से साया उठा पिता का अब मैं जाना डर का मतलब 26-01-2009-- को मेरे पिताश्री का स्वर्गवास हो गया है ............
 
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ग़ज़ल - ऐसे मन मत मारा कर

ऐसे मन मत मारा कर हंसकर वक्त गुज़ारा कर जग से क्या ले जाएगा सोचा और विचारा कर अपनी सुध-बुध लेने को दरपन रोज़ निहारा कर मन के "मनके" महकेंगे मन से उसे पुकारा कर इस अँधेरी दुनिया में दीपक तू उजियारा कर कवि दीपक गुप्ता www.kavideepakgupta.com 9811153282
 
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नया मतला और तीन शेर

ज़मीं को भूल बैठा है हवा में झूल बैठा है वजह कुछ भी नहीं, जिसको दिए वो तूल बैठा है ज़रा से सूद की खातिर गंवाकर "मूल" बैठा है ग़ज़ल का शौक ये "दीपक" तेरे माकूल बैठा है कवि दीपक गुप्ता 9811153282 - 9311153282 www.kavideepakgupta.com Delhi NCR, India
 
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एक नया मतला और दो शेर पेश कर रहा हूँ......

मुफलिसों पर हंसें किसलिए उनपे ताने कसें किसलिए सांप तक ये लगे सोचने आदमी को डसें किसलिए तुमको मालूम है, प्यार में उसने काटी नसें किसलिए कवि दीपक गुप्ता 9811153282 - 9311153282 Delhi NCR , India http://www.kavideepakgupta.com/
 
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