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ओशो चिन्‍तन

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05 Jun 2010
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बच्चों को अंतर्मुखी कैसे बनाया जाए?

                समाप्‍त :::            सौजन्‍य से – ओशो न्‍यूज लेटर
 
राजेंद्र त्‍यागी
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ओशो चिन्‍तन

बच्चों को अंतर्मुखी कैसे बनाया जाए? गतांक से आगे::::फ़्रायड एक बड़ा मनोवैज्ञानिक हुआ। अपनी पत्नी और अपने बच्चे के साथ एक दिन बगीचे में घूमने गया था। जब सांझ को वापस लौटने लगा, अंधेरा घिर गया, तो देखा दोनों ने कि बच्चा कहीं नदारद है। फ़्रायड की पत्नी
 
राजेंद्र त्‍यागी
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बच्चों को अंतर्मुखी कैसे बनाया जाए?

पहली तो बात यह है कि बच्चों को कैसा बनाया जाए, इसकी बजाय हमेशा यह सोचना चाहिए, खुद को कैसा बनाया जाए। हमेशा हम यह सोचते हैं कि दूसरों को कैसा बनाया जाए। और मैं यह भी आपसे कहूं कि वही व्यक्ति यह पूछता है कि दूसरों को कैसा बनाया जाए, जो खुद ठीक से बनने में
 
राजेंद्र त्‍यागी
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इस जीवन में मैंने दुख ही दुख क्यों पाया है?

दुख ही दुख अगर पाया है तो बड़ी मेहनत की होगी पाने के लिए, बड़ा श्रम किया होगा, बड़ी साधना की होगी, तपश्र्चर्या की होगी! अगर दुख ही दुख पाया है तो बड़ी कुशलता अर्जित की होगी! दुख कुछ ऐसे नहीं मिलता, मुफ्त नहीं मिलता। दुख के लिए कीमत चुकानी पड़ती
 
राजेंद्र त्‍यागी
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प्रेम स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं !

"चूंकि मैं अपनी स्वतंत्रता चाहता हूं, अपनी प्रेयसी को हर संभव स्वतंत्रता देता हूं। लेकिन मैं पाता हूं कि पहले उसका ध्यान रखने का नतीजा यह होता है कि अंततः मैं स्वयं को ही चोट पहुंचाता हूं।' अपनी प्रेयसी को स्वतंत्रता देने का तुम्हारा विचार ही गलत है।
 
राजेंद्र त्‍यागी
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भावनाओं का निकास कैसे करें ?

(सौजन्‍य से : ओशो न्‍यूज लेटर)
 
राजेंद्र त्‍यागी
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दुख की ईंटें हटाकर सुख की ईंटें रखिये

गतांश से आगेयह भूल इसलिए हो गई कि हम शरीर के शत्रु हैं। सारी मनुष्यता अब तक शरीर की दुश्मन रही है। इंद्रियों के दुश्मन हैं। और इंद्रियां द्वार हैं जीवन के। इंद्रियों की दुश्मनी की जरूरत नहीं है। इंद्रियों की गुलामी न हो, इतना ही काफी है। इंद्रियों की
 
राजेंद्र त्‍यागी
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दुख की ईंटें हटाकर सुख की ईंटें रखिये

आज तक का समाज दुख से भरा हुआ समाज है, उसकी ईंट ही दुख की है, उसकी बुनियाद ही दुख की है। और जब दुखी समाज होगा तो समाज में हिंसा होगी, क्योंकि दुखी आदमी हिंसा करेगा। और जब समाज दुखी होगा और जीवन दुखी होगा तो आदमी क्रोधी होगा, दुखी आदमी क्रोध करेगा। और जब
 
राजेंद्र त्‍यागी
Feb 21 2010 03:00 AM
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दिल दे दिया है, जान भी देंगे, सब्जी नहीं लायेंगे सनम

अमृत साधनाअभी मैं टैक्सी में बैठकर आ रही थी, टैक्सी ड्राइवर ने रेडियो मिर्ची चला रखा था। दोपहर का वक्त था इसलिए पुराने गाने बज रहे थे। यह गाना सुना: "दिल दे दिया है, जान भी देंगे, दगा नहीं देंगेे सनम।' मुझे हंसी आ गई। यह गाना कम से कम तीस साल पुराना
 
राजेंद्र त्‍यागी
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नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे

तो मैं आपसे निवेदन करता हूं, नैतिक होने से कोई धार्मिक नहीं होता। नैतिक होने से वस्तुतः कोई नैतिक ही नहीं होता है, क्योंकि नैतिकता अहंकार को समाप्त ही नहीं कर6ती और बढ़ाती है। और अहंकार सबसे बड़ी अनैतिकता है। धार्मिक होने से यह होता है। धार्मिक चित्त,
 
राजेंद्र त्‍यागी
Feb 16 2010 03:00 AM
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नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे

कनफ्यूशियस कुछ दिनों के लिए एक दफा मजिस्ट्रेट हो गया था। ज्यादा दिन नहीं रह सका। क्योंकि अच्छा आदमी मजिस्ट्रेट ज्यादा दिन नहीं रह सकता। मजिस्ट्रेट ज्यादा दिन वही रह सकता है जिसके पास कोई आत्मा न हो। कनफ्यूशियस मजिस्ट्रेट हो गया था, उसके पास आत्मा थी
 
राजेंद्र त्‍यागी
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नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे

इन्हीं नैतिक व्यक्तियों ने नरक की कल्पना की है कि चोरों को वहां जलवाएंगे कड़ाहियों में, बेईमानों को वहां आग में डालेंगे, कीड़े-मकोड़े सताएंगे, और नरक में अनंतकालीन कष्ट देंगे। ऐसे-ऐसे धर्म हैं जो कहते हैं कि अनंतकाल के लिए नरक में डाल दिए जाएंगे, अनंतकाल
 
राजेंद्र त्‍यागी
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नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे

नैतिक व्यक्ति तो द्वंद्वग्रस्त व्यक्ति है। नैतिक व्यक्ति धार्मिक व्यक्ति नहीं है। तो क्या मैं यह कह रहा हूं कि आप अनैतिक हो जाएं? नहीं, मैं आपसे यह कह रहा हूं कि नैतिक होने से आप इस भूल में मत पड़ जाना कि आप धार्मिक हो गए हैं। धार्मिक होना आयाम ही दूसरा
 
राजेंद्र त्‍यागी
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नीति मार्ग नहीं है --गतांक से आगे

दो व्यक्ति पति और पत्नी जंगल से लौटते थे। वे दोनों बहुत साधु-चरित्र थे, बहुत नैतिक थे। न तो चोरी करते थे, न बेईमानी, न असत्य बोलते थे, न संपत्ति का संग्रह करते थे। लकड़ियां काट लाते थे जंगल से, बेच देते थे, जो मिलता था उसे खा लेते थे। सांझ जो चावल, गेहूं
 
राजेंद्र त्‍यागी
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नीति मार्ग नहीं है।

 नीति मार्ग है इस तरह की बातें हजारों साल से प्रचलित हैं। और लोगों को यह भी खयाल है कि नैतिक हुए बिना कोई धार्मिक नहीं हो सकता, नैतिक होगा तब धार्मिक होगा। मैं आपसे कहना चाहूंगा, नैतिक होने से कोई कभी धार्मिक नहीं होता है। हां, कोई धार्मिक हो जाए तो
 
राजेंद्र त्‍यागी
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प्रीति रूपांतरकारी रसायन

एक तत्व हमारे भीतर है, जिसको प्रीति कहें। यह जो तत्व हमारे भीतर है-प्रीति, इसी के आधार पर हम जीते हैं। चाहे हम गलत ही जीएं, तो भी हमारा आधार प्रीति ही होता है। कोई आदमी धन कमाने में लगा है; धन तो ऊपर की बात है, भीतर तो प्रीति से ही जी रहा है--धन से उसकी
 
राजेंद्र त्‍यागी
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शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं।

योग का कहना है कि हमारे भीतर शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर चेतन और अचेतन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर एक ही अस्तित्व है, जिसके ये दो छोर हैं। और इसलिए किसी भी छोर से प्रभावित किया जा सकता है। तिब्बत में एक प्रयोग है, जिसका नाम
 
राजेंद्र त्‍यागी
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अभय समाधि है!

धर्म में जो भय से प्रवेश करते हैं, वे भ्रम में ही रहते हैं कि उनका धर्म में प्रवेश हुआ है। भय और धर्म का विरोध है। अभय के अतिरिक्त धर्म का और कोई द्वार नहीं है। कोई पूछता था : ''आप कहते हैं कि प्रभु भीतर है। पर मुझे तो कोई भी दिखाई नहीं पड़ता!'' उससे
 
राजेंद्र त्‍यागी
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सूर्य पर ध्यान दो!

मनुष्य शुभ है या अशुभ?'' मैंने कहा स्वरूपत: शुभ। और, इस आशा व अपेक्षा को सबल होने दो। क्योंकि जीवन उ‌र्ध्वगमन के लिए इससे अधिक महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है।'' एक राजा की कथा है, जिसने कि अपने तीन दरबारियों को एक ही अपराध के लिए तीन प्रकार की सजाएं दी थी
 
राजेंद्र त्‍यागी
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प्रेम ज्ञान है!

मेरा संदेश छोटा-सा है- ''प्रेम करो। सबको प्रेम करो। और ध्यान रहे कि इससे बड़ा कोई भी संदेश न है, न हो सकता है।'' मैंने सुना है : एक संध्या किसी नगर से एक अर्थी निकलती थी। बहुत लोग उस अर्थी के साथ थे। और, कोई राजा नहीं, बस एक भिखारी मर गया था। जिसके प
 
राजेंद्र त्‍यागी
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स्वयं को पाओ!

आविष्कार! आविष्कार! आविष्कार! कितने आविष्कार रोज हो रहे हैं! लेकिन जीवन संताप से संताप बनता जाता है। नरक को समझने के लिए अब किन्हीं कल्पनाओं की आवश्यकता नहीं। इस जगत को बतला कर कह देना ही काफी है : 'नरक ऐसा होता है।' और इसके पीछे कारण क्या है? कारण ह
 
राजेंद्र त्‍यागी
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प्रेम बड़ा शास्‍त्र !

शास्त्र क्या कहते हैं, वह नहीं- प्रेम जो कहे, वही सत्य है। क्या प्रेम से भी बड़ा कोई शास्त्र है। एक बार मोजेज किसी नदी के तट से निकलते थे। उन्होंने एक गड़रिये को स्वयं से बातें करते सुना। वह गड़रिया कह रहा था, ''ओ परमात्मा! मैंने तेरे संबंध में बहुत-
 
राजेंद्र त्‍यागी
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ध्यान के लघु प्रयोग

विपरीत विचार! यह एक सुंदर व उपयोगी विधि है। उदाहरण के लिए- यदि आप बहुत असंतुष्ट महसूस कर रहे हैं, तो उसके विपरीत संतोष का मनन करें- संतोष क्या है? एक संतुलन लाएं। अगर आपके मन में क्रोध उठ रहा है, तो करुणा को ले आएं, करुणा के बारे में विचार करें। और,
 
राजेंद्र त्‍यागी
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ध्यान के लघु प्रयोग

वृक्ष से मैत्री! किसी वृक्ष के पास जाओ, वृक्ष से बातें करें, वृक्ष को छूएं, वृक्ष को गले लगाएं, वृक्ष को महसूस करें, वृक्ष के पास बैठें और वृक्ष को भी महसूस होने दें कि आप एक अच्छे आदमी हैं और आपकी आकांक्षा उसे चोट पहुंचाने की नहीं है। धीरे-धीरे मैत्
 
राजेंद्र त्‍यागी
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जागो! (पथ का अंतिम प्रदीप)

ईश्वर कहां है? ईश्वर खोजते लोग मेरे पास आते हैं। मैं उनसे कहता हूं कि ईश्वर प्रतिक्षण और प्रत्येक स्थान पर है। उसे खोजने कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है। जागो और देखो। और जागकर जो भी देखा जाता है, वह परमात्मा ही है। सूफी कवि हाफिज अपने गुरु के आश्रम
 
राजेंद्र त्‍यागी
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जीवन कला!

मनुष्य को प्रतिक्षण और प्रतिपल नया कर लेना होता है। उसे अपने को ही जन्म देना होता है। स्वयं के सतत जन्म की इस कला को जो नहीं जानते हैं, वे जानें कि वे कभी के मर चुके हैं। रात्रि कुछ लोग आये । वे पूछने लगे, ''धर्म क्या है?'' मैंने उनसे कहा, ''धर्म मनु
 
राजेंद्र त्‍यागी
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मुझे कुछ नहीं चाहिए!

परमात्मा के अतिरिक्त और कोई संतुष्टिं नहीं। उसके सिवाय और कुछ भी मनुष्य के हृदय को भरने में असमर्थ है। एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी। किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा, ''जो भी चाहते हो, मांग लो।'' दिवस के प्रथम याचक
 
राजेंद्र त्‍यागी
Dec 29 2009 11:40 AM
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पाप-पुण्य!

कुछ युवकों ने मुझ से पूछा : ''पाप क्या है?'' मैंने कहा, ''मूर्च्‍छा'' वस्तुत: होश पूर्वक कोई भी पाप करना असंभव है। इसलिए, मैं कहता हूं कि जो परिपूर्ण होश में हो सके, वही पुण्य है। और जो मूच्र्छा, बेहोशी के बिना न हो सके वही पाप है। एक अंधकार पूर्ण रा
 
राजेंद्र त्‍यागी
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संपत्ति और भय!

मैं लोगों को भय से कांपता देखता हूं। उनका पूरा जीवन ही भय के नारकीय कंपन में बीता जाता है, क्योंकि वे केवल उस संपत्ति को ही जानते हैं, जो कि उनके बाहर है। बाहर की संपत्ति जितनी बढ़ती है, उतना ही भय बढ़ता जाता है- जब कि लोग भय को मिटाने को ही बाहर की
 
राजेंद्र त्‍यागी
Dec 29 2009 11:40 AM
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भीतर के प्रकाश को जानों!

सत्‍य के संबंध में विवाद सुनता हूं, तो आश्चर्य होता है। निश्चय ही जो विवाद में हैं, वे अज्ञान में होंगे। क्योंकि, ज्ञान तो निर्विवाद है। ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है। सभी पक्ष अज्ञान के हैं। ज्ञान तो निष्पक्ष है। फिर, जो विवादग्रस्त विचारधाराओं और पक्षप
 
राजेंद्र त्‍यागी
Dec 29 2009 11:40 AM
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ध्यान के लघु प्रयोग

हां' का अनुसरण! एक महीने के लिए सिर्फ 'हां' का अनुसरण करें, हां के मार्ग पर चलें। एक महीने के लिए 'नहीं' के रास्ते पर न जाएं। 'हां' को जितना संभव हो सके सहयोग दें। उससे आप अखंड होंगे। 'नहीं' कभी जोड़ती नहीं है। 'हां' जोड़ती है, क्योंकि 'हां' स्वीकार
 
राजेंद्र त्‍यागी
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परम निधि की खोज!

आदर्श को चुनने में कभी कंजूसी मत करना। वह तो ऊंचे से ऊंचा होना चाहिए। वस्तुत: तो परमात्मा से नीचे जो है, वह आदर्श ही नहीं है। आदर्श उसकी भविष्यवाणी है, जो कि अंतत: तुम करके दिखा दोगे। वह तुम्हारे स्वरूप की परम अभिव्यक्ति की घोषणा है। सुबह से सांझ तक
 
राजेंद्र त्‍यागी
Dec 29 2009 11:40 AM
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ध्यान के लघु प्रयोग

निष्क्रिय ध्यान! यह ध्यान प्रात:काल के लिए है। इस ध्यान में रीढ़ को सीधा रख कर, आंखें बंद करके, गर्दन को सीधा रखना है। ओंठ बंद हों और जीभ तालु से लगी हो। श्वास धीमी गहरी लेना है। और ध्यान नाभि के पास रखना है। नाभि-केंद्र पर श्वास के कारण जो कंपन मालू
 
राजेंद्र त्‍यागी
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स्वार्थी बनो और देखो

स्वार्थ शब्द का अर्थ समझते हो? शब्द बड़ा प्यारा है, लेकिन गलत हाथों में पड़ गया है। स्वार्थ का अर्थ होता है--आत्मार्थ। अपना सुख, स्व का अर्थ। तो मैं तो स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता। मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं। मैं तो कहता हूं, धर्म का अर्थ ही
 
राजेंद्र त्‍यागी
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दुनिया में ईमानदारी क्योँ नहीं है?

जब तक चपरासी अपमानित है और राष्ट्रपति सम्मानित है तब तक दुनिया में ईमानदारी नहीं हो सकती क्योंकि चपरासी कैसे बैठा रहे चपरासी की जगह पर, और जिंदगी इतनी बड़ी नहीं है कि सत्य का सहारा लिए बैठा रहे। और जब असत्य सफलता लाता हो तो कौन पागल होगा उसे छोड़ दे!
 
राजेंद्र त्‍यागी
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प्रेम का अकाल क्योँ है?

मैं आपको एक सूत्र की बात कहूं: जिस मनुष्य के पास प्रेम है उसकी प्रेम की मांग मिट जाती है। और यह भी मैं आपको कहूं: जिसकी प्रेम की मांग मिट जाती है वही केवल प्रेम को दे सकता है। जो खुद मांग रहा है वह दे नहीं सकता है। इस जगत में केवल वे लोग प्रेम दे सकत
 
राजेंद्र त्‍यागी
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क्रोध को दबाइए मत!

शरीर मात्र साधन है। उसके संबंध में कोई दुर्भाव मन में न रखें। ऐसी बहुत-सी बातें प्रचलित हो गयी हैं कि शरीर दुश्मन है, और शरीर पाप है, और शरीर बुरा है, और शत्रु है, और इसका दमन करना है। वे मैं आपको कहूं, गलत हैं। न शरीर शत्रु है, न शरीर मित्र है। आप उ
 
राजेंद्र त्‍यागी
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सेक्स एक शक्ति है, उसको समझिए।

गतांक से आगे--- आदमी को हमने परवर्ट किया है, विकृत किया है और अच्छे नामों के आधार पर विकृत किया है। ब्रह्मचर्य की बात हम करते हैं। लेकिन कभी इस बात की चेष्टा नहीं करते कि पहले मनुष्य की काम की ऊर्जा को समझा जाए, फिर उसे रूपांतरित करने के प्रयोग भी कि
 
राजेंद्र त्‍यागी
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व्यक्तियों को वस्तु मत बनाओ

हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं। न तो हम पदार्थ के जगत में रहते हैं और न हम स्वर्ग के, चेतना के जगत में रहते हैं। हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं। इसे ठीक से, अपने आस-पास थोड़ी नजर फेंक कर देखेंगे, तो समझ में आ सकेगा। हम वस्तुओं के जगत में रहते हैं-वी ल
 
राजेंद्र त्‍यागी
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सुख और दुख एक ही अनुभव के नाम

म नुष्य के अनुभव में, प्रतीति में सुख और दुख दो अनुभूतियां हैं-गहरी से गहरी। अस्तित्व का जो अनुभव है, अगर हम नाम को छोड़ दें, तो या तो सुख की भांति होता है या दुख की भांति होता है। और सुख और दुख भी दो चीजें नहीं हैं। अगर हम नाम बिलकुल छोड़ दें, तो सुख
 
राजेंद्र त्‍यागी